गडकरी जी इतना भी झूठ मत बोलो : संपादकीय व्यंग्य

PRAGYA KA PANNA
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2015 से अब तक सरकार ने बड़े पूंजीपतियों का 11 लाख करोड़ का लोन माफ कर दिया..मसलन सरकार ने कहा बेटा..बम्बानी..तुम बैंक से ब्याज लिए थे..बम्बानी बोले हां लिए तो थे सर…सरकार बोली चुनाव में बहुत चंदा वंदा देते हो तुम लोग..नहीं चुकाओगे तो कोई बात नहीं..ऐ बैंक वाले बाबू चलो इनका कर्जा माफ करो..और भूल जाओ कि बम्बानी भाई ने तुमसे पैसे उधार लिए थे..बैंक बोली जो हुक्म मेरे आका..ऐसा करते करते..बैंकों ने 11 लाख करोड़ रूपए उद्योग पतियों के माफ कर दिए..कितना 11 लाख करोड़..जब इतना पैसा माफ कर दिया जाएगा..बैंक तो बैंक हैं..कुबेर का खजाना खाली हो जाएगा..

बैंके बेकार होने लगी तो..सरकार ने उनको उठाकर बिक्री काउंटर पर रख दिया..इसीलिए अब बैंक बूंक और LIC फेलआईसी को बेचकर सरकार 1 दशमलव 75 लाख करोड़ कमाएगी..दुकान से 11 लाख करोड़ की उधारी माफ करवाकर..सरकार पूरी दुकान ही 1.75 लाख करोड़ में बेच देगी..माफ कीजिएगा..मॉनिटाइज करेगी..माफ कीजिएगा..प्राइवेटाइज करेगी..इसीलिए संसद में बैंकिंग संशोधन बिल लाया जाएगा..आज से 52 साल पहले 20 बैंकों का सरकारीकरण हुआ था..52 साल बाद..अब 11 सरकारी बैंकें रह गई हैं..क्या ये बैंकें ही हमारे महान भारत देश को विश्व गुरू होने से रोक रही हैं..या खेला कुछ और ही है गुरू आज इसी को आसान भाषा में समझेंगे..सब्सक्राइब वब्सक्राइब का बार बार नहीं कहूंगी..आप अपना देख लीजिए..

अभी दो बैंकों का कॉरपोरेशन बैंक ऑफ इंडिया IDBI बैंक और एलआईसी का नंबर है..बैंकों की मनमानी से परेशान होकर इंदिरा गांधी जी ने प्राइवेट बैंकों का राष्टीयकरण किया था..और अब राष्ट्रीय बैंकों से उधारी माफ करवाकर उनको प्राइवेट किया जाएगा..राष्ट्रीय बैंक निजी होंगे निजी का मतलब है बिकेंगे..बिकेंगे का मतलब है..कोई चिंटू पिंटू टाइप का उद्योगपति सरकार से सेटिंग करके लाइन में लगा होगा..कि फलानी बैंक हम खरीदेंगे..

दोस्तों पता नहीं भारत के उद्योग पतियों को बने बनाए सरकारी उद्योग..एयर पोर्ट..बैंक वगैरहही क्यों पसंद आते हैं..अडानी भईया जैसे लोग 1 हजार करोड़ रूपए रोजाना कामाते हैं..अंबानी को पछाड़कर नंबर वन रईस भी बन गए हैं..ये लोग चलती फिरती बैंक हैं..जिस बैंक में पैसा जमा कर दें वो वर्ल्ड बैंक बन जाए..बड़ा काम थोड़े हैं..भारत की सरकारी बैंकों को चलने दो..बिचारी सराकारी कर्मचारी लोग काम धाम करते हैं..पता नहीं लोग सरकारी बैंकें खरीदने के चक्कर में क्यों लगे रहते हैं..सरकार से खरीदना आसान है..या सरकार बेचती आसानी से है..या कोई होलसेल का काउंटर खोल दिया है..अगर आप समझदार हैं तो इसे समझ सकते हैं तो समझिए..

ये निजीकरण क्या है..क्या निजीकरण से बैंक में जमा आपका पैसा दोगुना हो जाएगा क्या..क्या निजीकरण से खाते में 15-15 लाख रुपए आने लगेंगे..क्या निजीकरण से हवाई चप्पल पहने वाला हवाई जहाज में लटक जाएगा..क्या निजीकरण से हम विश्वगुरू होने जा रहे हैं..क्या बैंकों के निजीकरण से हम 5 ट्रिलियन इकोनॉमी होने जा रहे हैं..

दोस्तों अब तक के सरकारी संस्थान बिक्री कार्यक्रम से ये समझ में आता है कि सरकार से जब कोई सरकारी काम नहीं सधता है..जब सरकार अपनी जिम्मेदारी से भागती है..या जब सरकार से अपनी कंपनी नहीं चलाए चलती है..या फिर जब सरकार अपने किसी लाड़ले को कोई कंपनी उपहार देना चाहती है तो उसे दे देती है..इसे ही कलयुग में नीजीकरण कहा गया है..निजीकरण के नुकसान क्या होते हैं..वो भी समझ लीजिए..निजीकरण के बाद सरकारी कर्मचारियों की नींद हराम हो जाती है..लड़का सरकारी से प्राइवेट कंपनी का नौकर हो जाता है..सरकारी कर्मचारी वाले ठाठ खत्म हो जाते हैं..नौकरी से निकाले भी जा सकते हैं..

सरकारी बैंकों से किसानों विसानों को खूब कर्ज मिलता है..सरकारें माफ भी कर देती हैं..लेकिन प्राइवेट लाला तो एक फूटी कौडी नहीं छोड़ेगा..अगर सरकारी बैंकों का निजीकरण हो गया तो निजी बैंक मनमानी नहीं करेंगे इसकी क्या गारंटी है..क्या भारत में कर्ज लेना आसान रह जाएगा..आज भी आप होम लोन लोन लेने जाईये हर बैंक का ब्याज सिस्टम अलग अलग है..मसला ये है कि सरकार पूरी तरह से अपना पल्ला जनता से झाड़कर जनता को बाजार के हवाले करना चाहती है..

ना सरकार से उद्योग चलाए चल रहे है..ना ही बैंक..बांटों और राज करो से बेचो और राज करो होने जाएगा..मैं इस मॉनसून सेल के खिलाफ नहीं हूं..लेकिन एक नागरिक होने के नाते ये जानती हूं..कि घर की कोई चीज दो ही कारणों से बेची जाती है..या तो मजबूरी में या फिर उसकी जगह नई लाने के लिए..सरकार की स्थिति में सरकार मजबूर है..सरकार से हो नहीं पा रहा है..वर्ना कोई सरकार चुनावों के समय बेचो अभियान नहीं चलाती..ये तो सरकार भी जानती है.

Disclamer- उपर्योक्त लेख लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार द्वारा लिखा गया है. लेख में सुचनाओं के साथ उनके निजी विचारों का भी मिश्रण है. सूचना वरिष्ठ पत्रकार के द्वारा लिखी गई है. जिसको ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है. लेक में विचार और विचारधारा लेखक की अपनी है. लेख का मक्सद किसी व्यक्ति धर्म जाति संप्रदाय या दल को ठेस पहुंचाने का नहीं है. लेख में प्रस्तुत राय और नजरिया लेखक का अपना है.

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