कौन थे रंगा-बिल्ला ? ऐसा क्या किया था जिससे पूरा देश हिल गया था…

इन दिनों रंगा बिल्ला नाम बहुत सुना जा रहा है. कुछ लोग तो इन्हें कॉमिक्स के कार्टून मानते हैं. तो दूसरी तरफ इनके नाम सुनकर बड़े बड़े अधिकारियों के पसीने भी छूट जाते हैं. आखिर कौन थे रंगा बिल्ला क्या आप जानते हैं.

Who was the ranga billa kidnapping murder case
Who was the ranga billa kidnapping murder case

अभी हालही में आईएनएक्स मीडिया भ्रष्टाचार मामले में 99 दिनों तक जेल में बंद रहे पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम की जमानत के लिए उनके वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि क्या चिदंबरम कोई रंगा-बिल्ला हैं, जो उन्हें जमानत नहीं दी सकती.

वहीं सोशल मीडिया पर पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के विरोधी भी उनकी जोड़ी की तुलना रंगा-बिल्ला से करते रहे हैं. इतना ही नहीं लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति रॉय ने भी कुछ इसी तरह का बयान दिया है. दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में रॉय ने छात्रों से कहा कि ‘नागरिक जनसंख्या रजिस्टर (NPR) के लिए जानकारी मांगे जाने पर आप अपने असली नामों की बजाय रंगा-बिल्ला जैसे नाम और घर का पता 7 रेस कोर्स (प्रधानमंत्री का आवास) लिखवा दें.

दरअसल रंगा-बिल्ला कोई काल्पनिक या कॉमिक्स के कार्टून का नाम नहीं हैं. ये दोनों भारत के कुख्यात अपराधियों में से एक थे. इन दोनों ने ऐसा गुनाह किया था कि पूरा देश हिल गया था. इसकी चर्चा विदेशों तक हुई थी. रंगा का असली नाम कुलजीत सिंह और बिल्ला का असली नाम जसबीर सिंह था.

तकरीबन 40 पहले 26 अगस्त 1978 को रंगा और बिल्ला ने अपनी कार में लिफ्ट देने के बहाने नौसेना के अधिकारी मदन चोपड़ा के बच्चे गीता और संजय चोपड़ा का अपहरण कर लिया था. बाद में दोनों की हत्या कर दी थी. रंगा और बिल्ला ने एक सुनसान इलाके में कार रोककर पहले संजय चोपड़ा की हत्या की और गीता के साथ बलात्कार किया था.

अपहरण होने के 2 दिन बाद 28 अगस्त 1978 को दोनो बच्चों के शव मिले थे. मामला जब मीडिया में आया तो दिल्ली पुलिस को तेजी से जांच करनी पड़ी थी. और पूरे देश में रंगा और बिल्ला की फोटो जारी की गई थी. तब के समय में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई थे. घटना के जानकारी में आते ही उन्होंने खुद जांच और कार्रवाई का आदेश दिया.

इस हत्या और बलात्कार की घटना से पूरे देश में आक्रोश था. हर तरफ दोनों के खिलाफ प्रदर्शन चल रहा था. 8 सितंबर 1978 को रंगा और बिल्ला को आगरा में गिरफ्तार किया गया. इत्तेफाक से ये दोनों कालका मेल के उस डिब्बे में चढ़ गए थे जो सैनिकों के लिए आरक्षित था. तभी एक सैनिक ने अखबार में छपी उनकी फोटो से उन्हें पहचान लिया और वहीं से दोनों गिरफ्तार कर लिए गये.

गिरफ्तार होने के बाद रंगा ने कुबूला कि मैं लड़की को उस तरफ ले जा रहा था जहाँ उसके भाई की लाश पड़ी हुई थी. मैं उसके दाहिनी तरफ चल रहा था. बिल्ला ने मुझे इशारा किया और मैं थोड़ा आगे चलने लगा. बिल्ला ने पूरी ताकत से लड़की की गर्दन पर तलवार से वार किया. इस वार के तुरंत बाद ही लड़की की मौत हो गई. फिर हमने उसकी लाश उठाकर झाड़ी में फेंक दी.

इस घटना की चर्चा विदेशों तक में भी हुई थी. 4 साल तक चली सुनवाई के बाद 1982 में रंगा और बिल्ला को फांसी दे दी गई थी.

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