तालिबान कौन हैं ? इनकी शुरुआत कहाँ से हुई ? इतनी खौफ में क्यों है दुनिया ? जानिए सबकुछ-

दुनिया में हर तरफ बस एक ही नाम गूंज रहा है तालिबान तालिबान taliban आखिर ये तालिबानी taliban हैं कौन इनका जन्म कहाँ से हुआ और ये अफ़ग़ानिस्तान में इतना आतंक क्यों मचाये हैं ? आखिर चाहते क्या हैं ये तालिबानी ? आइये जानते हैं-

who are taliban ? where did they start ?
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सोवियत संघ की वापसी से तालिबान का उभार हुआ

बात नब्बे के दशक के शुरुआती दौर की है जब सोवियत संघ अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुला रहा था. उसी समय उत्तरी पाकिस्तान में तालिबान taliban का उभार मतलब जन्म हुआ था. पश्तो भाषा में तालिबान का मतलब होता है छात्र, खासकर ऐसे छात्र जो कट्टर इस्लामी धार्मिक शिक्षा से प्रेरित हों. कट्टर सुन्नी इस्लामी विद्वानों ने धार्मिक संस्थाओं के सहयोग से पाकिस्तान में इनकी बुनियाद खड़ी की थी. तालिबान पर देववंदी विचारधारा का पूरा प्रभाव है.

तालिबान ने जनता को रिझाया

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तालिबान को और मजबूती देने के लिए सऊदी अरब ने फंडिंग की थी. तालिबान taliban के आंदोलन में सुन्नी इस्लाम की कट्टर मान्यताओं का प्रचार किया जाता था. शुरुआत में तालिबान taliban ने ऐलान किया कि इस्लामी इलाकों से विदेशी शासन खत्म करेंगे, वहां शरिया कानून और इस्लामी राज्य स्थापित करेंगे. ये सब सुन कर शुरू-शुरू. में तो सामंतों के अत्याचार, अधिकारियों के करप्शन से परेशान जनता ने तालिबान को एक मसीहा के रूप में देखा और कई इलाकों में कबाइली लोगों ने तालिबानियों का स्वागत भी किया लेकिन बाद में कट्टरता ने धीरे धीरे तालिबान taliban की ये लोकप्रियता खत्म कर दी मगर तब तक तालिबान taliban इतना पावरफुल हो चुका था कि अब उससे निजात पाना नामुमकिन हो गया था.

तालिबान को मजबूत करने में तीन देशों की अहम् भूमिका

इसी दौरान दक्षिण पश्चिम अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान taliban का प्रभाव तेजी से बढ़ा और सितंबर 1995 में उसने ईरान की सीमा से लगे हेरात प्रांत पर कब्ज़ा किया. इसके ठीक एक साल बाद तालिबान taliban ने अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी क़ाबुल पर कब्ज़ा जमाया. तालिबान को मजबूत करने में तीन देशों ने बड़ी भूमिका निभाई थी जिसमें पाकिस्तान के अलावा सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं इन तीनों देशों ने तालिबान सरकार को स्वीकार किया था. तालिबान के अधिकांश लड़ाके और कमांडर पाकिस्तान-अफगानिस्तान के सीमा इलाकों में स्थित कट्टर धार्मिक संगठनों में पढ़े लोग, मौलवी और कबाइली गुटों के चीफ हैं.

तालिबान ने दिखाई कट्टरता

1995 में तालिबान taliban ने अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति रहे बुरहानुद्दीन रब्बानी को सत्ता से हटाया था. साल 1998 आते-आते, क़रीब 90 प्रतिशत अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का नियंत्रण हो गया था. कब्ज़ा करने के बाद तालिबान ने वहां की जनता पर अपने अत्याचार शुरू कर दिए और सज़ा देने के इस्लामिक तौर तरीकों को लागू किया जिसमें हत्या और व्याभिचार के दोषियों को सार्वजनिक तौर पर फांसी देना और चोरी के मामले में दोषियों के अंग भंग करने जैसी सजाएं शामिल थीं. पुरुषों के लिए दाढ़ी और महिलाओं के लिए पूरे शरीर को ढकने वाले बुर्क़े का इस्तेमाल ज़रूरी कर दिया गया. तालिबान ने टेलीविजन, संगीत और सिनेमा पर पाबंदी लगा दी और 10 साल और उससे अधिक उम्र की लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक लगा दी.

तालिबानी शासन ख़त्म लेकिन तालिबान नहीं

अफगानिस्तान में रूस का प्रभाव खत्म करने के लिए तालिबान के पीछे अमेरिकी समर्थन था लेकिन जब 9/11 का हमला हुआ तो अमेरिका को तालिबान में कट्टर विचारधार की आंच महसूस हुई तब अमेरिका खुद तालिबानियों के खिलाफ जंग में उतर गया. साल 2001 से जब अमेरिकी और मित्र सेनाओं की कार्रवाई शुरू हुई तो तालिबान सिर्फ पहाड़ी इलाकों तक सीमित रह गया था. सात अक्टूबर, 2001 को अमेरिका के नेतृत्व में सैन्य गठबंधन ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया और दिसंबर के पहले सप्ताह में तालिबान का शासन ख़त्म हो गया. हमले में तालिबानी शासन तो ख़त्म हो गया लेकिन तालिबान पूरी तरह से नहीं ख़त्म हो पाया. काबुल-कंधार जैसे बड़े शहरों के बाद पहाड़ी और कबाइली इलाकों से तालिबान को खत्म करने में अमेरिकी और मित्र देशों की सेनाओं को पिछले 20 साल में भी सफलता नहीं मिल पाई थी. खासकर पाकिस्तान से सटे इलाकों में तालिबान को पाकिस्तानी समर्थन ने जिंदा रखा.

2012 में फिर वापस आया तालिबान

साल 2012 में नाटो बेस पर हमले के बाद से फिर तालिबान का उभार शुरू हुआ. सितंबर, 2012 में तालिबान लड़ाकों ने काबुल में कई हमले किए. इसके एक महीने बाद तालिबानी चरमपंथियों ने अक्टूबर, 2012 को मिंगोरा नगर में अपने स्कूल से घर लौट रही मलाला यूसुफ़ज़ई को गोली मार दी थी. इस घटना में मलाला बुरी तरह घायल हो गई थीं. उस वक्त पाकिस्तान में नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस घटना की निंदा हुई थी.

साल 2013 में जब अमेरिका ने ड्रोन हमले किये तो उसमें तालिबान का पाकिस्तान में कमान संभाल रहे हकीमुल्ला मेहसूद सहित तीन अहम नेताओं की मौत हुई. 2015 में तालिबान ने सामरिक रूप से महत्वपूर्ण कुंडूज के इलाके पर कब्जा कर फिर से वापसी के संकेत दे दिए. ये ऐसा वक्त था जब अमेरिका में सेनाओं की वापसी की मांग जोर पकड़ रही थी. अफगानिस्तान से अमेरिका की रूचि कम होती गई और तालिबान फिर मजबूत होता गया.

2020 में हुआ दोहा समझौता

भारी संख्या में विदेशी सैनिकों की मौजूदगी के बाद भी तालिबान ने धीरे-धीरे खुद को मज़बूत किया और अफ़ग़ानिस्तान में अपने प्रभाव को बढ़ाया. बतादें कि तालिबान के सबसे पहले चीफ मुल्ला उमर और फिर 2016 में मुल्ला मुख्तर मंसूर की अमेरिकी ड्रोन हमले में मौत के बाद से मौलवी हिब्तुल्लाह अखुंजादा तालिबान का चीफ है. वो तालिबान के राजनीतिक, धार्मिक और सैन्य मामलों का सुप्रीम कमांडर है. तालिबान ने अमेरिका के साथ साल 2018 में बातचीत शुरू कर दी थी और फरवरी, 2020 में दोहा में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया.

दोहा समझौता में क्या कहा गया ?

इस समझौते में अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को हटाने की प्रतिबद्धता जताई और तालिबान अमेरिकी सैनिकों पर हमले बंद करने को तैयार हुआ. इसके साथ ही तालिबान ने अपने नियंत्रण वाले इलाक़े में अल क़ायदा और दूसरे चरमपंथी संगठनों के प्रवेश पर पाबंदी लगाने की बात भी कही थी और राष्ट्रीय स्तर की शांति बातचीत में शामिल होने का भरोसा भी दिया था. लेकिन समझौते के अगले साल से ही तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान के आम नागिरकों और सुरक्षा बल को निशाना बनाना जारी रखा. अब अमेरिकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से जाने की तैयारी कर रहे हैं तब तालिबान अफ़गानिस्तान में हावी हो गया है.

बाइडेन के ऐलान करते ही तालिबान ने मोर्चा खोल दिया

जैसे ही अप्रैल 2021 में अमेरिकी सेनाओं की वापसी का ऐलान बाइडेन ने किया इसके बाद ही तालिबान ने मोर्चा खोल दिया और 90 हजार लड़ाकों वाले तालिबान ने 3 लाख से अधिक अफगान फौजों को सरेंडर करने पर मजबूर कर दिया. तालिबान की बढ़ती ताकत को देखते हुए अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी, उनके प्रमुख सहयोगियों, तालिबान से लड़ रहे प्रमुख विरोधी कमांडर अब्दुल रशीद दोस्तम और कई वॉरलॉर्ड्स को ताजिकिस्तान और ईरान में शरण लेना पड़ा है.

दुनिया देखती रह गई और तालिबान ने हथियारों के दम पर अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया. अफगानिस्तान के 3 करोड़ 84 लाख लोगों की आजादी, मानवाधिकार के मसले सब बर्बरियत के आगे सरेंडर कर गए. तालिबान लड़ाके काबुल के प्रमुख जगहों पर कब्जा करते जा रहे हैं. इसी के साथ दुनिया तालिबान के 20 साल पहले के बर्बर शासन को याद कर #SaveAfghanistan के नारे दे रही है.

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