तालिबान, अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट में कौन सबसे ज्यादा हिंसक है ? इनका मक़सद क्या है ?

तालिबान Taliban, अल-क़ायदा Al-Qaeda और इस्लामिक स्टेट Islamic State ये तीनों आतंकी संगठनों की विचारधारा कट्टरपंथ वाली है लेकिन तालिबान Taliban, अल-क़ायदा Al-Qaeda और इस्लामिक स्टेट Islamic State ये तीनों समूहों की महत्वाकांक्षाएं और काम करने के तरीके अलग-अलग हैं. आइये जानते हैं ये क्या चाहते हैं ? और देश के लिए कितने घातक हैं.

तालिबान, अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट में कौन सबसे ज्यादा हिंसक है ? इनका मक़सद क्या है ?
तालिबान Taliban, अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट में कौन सबसे ज्यादा हिंसक है ? इनका मक़सद क्या है ?

तालिबान Taliban कब से शुरू हुआ और क्या चाहता है ?

नब्बे के दशक के शुरुआती दौर में जब सोवियत संघ अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुला रहा था उसी समय उत्तरी पाकिस्तान में तालिबान Taliban का उभार मतलब जन्म हुआ था. पश्तो भाषा में तालिबान Taliban का मतलब छात्र होता है, खासकर ऐसे छात्र जो कट्टर इस्लामी धार्मिक शिक्षा से प्रेरित हों. कट्टर सुन्नी इस्लामी विद्वानों ने धार्मिक संस्थाओं के सहयोग से सबसे पहले पाकिस्तान में इनकी बुनियाद खड़ी की थी. तालिबान Taliban पर देववंदी विचारधारा का पूरा प्रभाव है.

तालिबान Taliban के आंदोलन में सुन्नी इस्लाम की कट्टर मान्यताओं का प्रचार किया जाता है. तालिबान Taliban का मकसद इस्लामी इलाकों से विदेशी शासन खत्म करना और वहां शरिया कानून और इस्लामी राज्य स्थापित करना है. जो इस समय अफगानिस्तान में देखने को मिल रहा है. तालिबान Taliban के अधिकांश लड़ाके और कमांडर पाकिस्तान-अफगानिस्तान के सीमा इलाकों में स्थित कट्टर धार्मिक संगठनों में पढ़े लोग मौलवी और कबाइली गुटों के चीफ हैं.

तालिबान Taliban की कट्टरता समझने के लिए आपको 20 साल पहले जाना होगा जब अफगानिस्तान में तालिबानियों का कब्ज़ा था उस समय तालिबान Taliban ने सज़ा देने के इस्लामिक तौर तरीकों को लागू किया था जिसमें हत्या और व्याभिचार के दोषियों को सार्वजनिक तौर पर फांसी देना और चोरी के मामले में दोषियों के अंग भंग करने जैसी सजाएं शामिल थीं. पुरुषों के लिए दाढ़ी और महिलाओं के लिए पूरे शरीर को ढकने वाले बुर्क़े का इस्तेमाल ज़रूरी कर दिया गया था. तालिबान ने टेलीविजन, संगीत और सिनेमा पर पाबंदी लगा दी थी और 10 साल और उससे अधिक उम्र की लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक लगा दी थी.

अल-क़ायदा Al-Qaeda कब से शुरू हुआ और क्या चाहता है ?

आतंकी संगठन अल-क़ायदा Al-Qaeda की भी उत्पत्ति अस्सी के दशक के आख़िर में सोवियत संघ के हमले के विरोध में हुई थी. इसके उदय का संबंध नब्बे के दशक में अफ़ग़ानिस्तान के अंदरूनी विवादों से भी है. अल-क़ायदा Al-Qaeda की स्थापना सऊदी अरबपति ओसामा बिन लादेन ने अस्सी के दशक के आख़िर में की थी. अल-क़ायदा Al-Qaeda का अर्थ होता है नेटवर्क. शुरू में सोवियत संघ के ख़िलाफ़ लड़ रहे मुसलमानों को अल-क़ायदा ने हथियारों और दूसरी चीज़ों से मदद पहुंचाई थी. इसके लिए अल-क़ायदा Al-Qaeda ने दुनिया भर से मुसलमानों को अपने संगठन के लिए भर्ती किया था.

साल 1996 की शुरुआत में अल-क़ायदा Al-Qaeda एक ऐसा संगठन बन गया था जिसकी भूमिका एक सपोर्ट नेटवर्क से कहीं ज़्यादा हो गई थी. दुनिया भर में चरमपंथी गतिविधियों को अंजाम देने के दावे के साथ अल-क़ायदा Al-Qaeda एक जिहादी संगठन बन गया था. अल-क़ायदा अपना सबसे बड़ा दुश्मन अमेरिका को मानता है. अल-क़ायदा Al-Qaeda शिया मुसलमानों को भी विधर्मी मानता है लेकिन उसका कहना है कि उनकी जान लेना बहुत कड़ा कदम होगा और संसाधनों की बर्बादी होगी. इससे जिहादी एजेंडे को भी नुक़सान पहुंचेगा.

अल-क़ायदा Al-Qaeda लड़ने के लिए सितंबर 11 जैसा भीषण हमला करता है. इसके अलावा वो मुसलमानों को समझाने के लिए प्रोपेगैंडा कैम्पेन शुरू करता है. अल-क़ायदा के अफगानिस्तान पहुँचने में तालिबान ने ही मदद की थी. तालिबान की हुकूमत ने कुछ तो एहसान में और कुछ पैसे की वजह से अल-क़ायदा को अफ़ग़ानिस्तान में पनाह दी, उनका स्वागत किया था.

हालही में अल-कायदा Al-Qaeda ने अमेरिका को शैतान का साम्राज्य बताया है. साथ ही उसने अफगानिस्तान में तालिबान की इस जीत को दुनिया में दबे-कुचले लोगों के लिए प्रेरणा बताया है. उसने कहा है कि इन सारी घटनाओं से साबित होता है कि केवल जिहाद से ही जीत हासिल की जा सकती है. अल-कायदा Al-Qaeda ने “इस्लामिक उम्माह को अफगानिस्तान में अल्लाह की दी गई आजादी मुबारक” नाम का संदेश जारी किया है. इसके साथ ही उसने लिखा- ओ अल्लाह ! लेवेंट, सोमालिया, यमन, कश्मीर और दुनिया की दूसरी इस्लामी जमीनों को इस्लाम के दुश्मनों से आजाद कराओ। ओ अल्लाह ! दुनिया भर में मुस्लिम कैदियों को आजादी दिलाओ.

इस्लामिक स्टेट Islamic State कब से शुरू हुआ और क्या चाहता है ?

साल 2003 में अमेरिका के इराक़ पर धावा बोलने के बाद इस्लामिक स्टेट Islamic State अस्तित्व में आया था. इसमें इराक़ी सेना और अल-क़ायदा से जुड़े लोग शामिल हुए थे. शुरू में अल-क़ायदा का इराक़ धड़ा इस्लामिक स्टेट Islamic State की सीधी अगुवाई कर रहा था. साल 2006 में इराक में अल-क़ायदा और दूसरे चरमपंथी गुटों का विलय हो गया और उन्होंने खुद को ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक़’ का नाम दिया. ये नया संगठन इस्लाम की दुनिया भर में अगुवाई करना चाहता था.

साल 2011 में जब इस्लामिक स्टेट Islamic State का प्रभाव सीरिया में बढ़ने लगा तो उसने अपनी खिलाफ़त का एलान किया और अल-क़ायदा से दूरी बना ली. इस्लामिक स्टेट Islamic State शुरू से ही अल-क़ायदा की तुलना में अधिक हिंसक रहा है. पश्चिमी ताक़तों से जंग के अलावा इस्लामिक स्टेट की लड़ाई उन मुसलमानों से भी है जो उसकी विचारधारा पर यकीन नहीं करते हैं. इस्लामिक स्टेट मध्य पूर्व में शिया मुसलमानों के अलावा अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमला करता रहा है.

इस्लामिक स्टेट Islamic State तालिबान को दुश्मन मानता है और उसका कहना है कि तालिबान ने अमेरिका के साथ समझौता करके गद्दारी की है. इस्लामिक स्टेट कई मोर्चों पर लड़ रहा है. अफ़ग़ानिस्तान में उसकी लड़ाई तालिबान के ख़िलाफ़ है जबकि साल 2014 में अल-क़ायदा से अलग होने के बाद उससे भी आईएस की लड़ाई रही है. इस्लामिक स्टेट Islamic State के लड़ने का तरीका बहुत हिंसक है. वो ज़्यादा बड़े इलाके को नियंत्रित करना चाहता है. वो ऐसा निज़ाम खड़ा करना चाहता है जहां मुसलमान लोग इस्लाम की उसकी व्याख्या के अनुसार रहें.

इस्लामिक स्टेट Islamic State के लिए चरमपंथ एक क्रांतिकारी लड़ाई का हिस्सा है. उसके नियंत्रण वाले इलाकों में सामूहिक नरसंहार, लोगों का सार्वजनिक तौर पर सिर काट देने और बलात्कार की घटनाएं आम बात हैं. वे लोगों को डराकर रखना चाहते हैं जबकि अल क़ायदा इस मामले में थोड़ा नरम है.

तालिबान, अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट का एक ही दुश्मन है और वो है अमेरिका और पश्चिमी ताक़तें. तीनों के बीच सबसे बड़ा अंतर ये है कि अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट की अंतरराष्ट्रीय स्तर की महत्वाकांक्षाएं हैं जबकि तालिबान का फोकस केवल अफ़ग़ानिस्तान पर है. तालिबान, अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट, ये तीनों ही संगठन इस्लाम की अपने तरीके से कट्टरपंथी व्याख्या करते हैं. तीनों संगठनों के भर्ती के तरीके भी अलग हैं. तीनों संगठनों ने अपने प्रभाव क्षेत्र वाले इलाकों में स्थानीय स्तर पर भर्तियां की हैं. लेकिन अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट मध्य पूर्व के बाहर से भी लोगों को अपने संगठन से जोड़ने में कामयाब रहे हैं. तीनों का एक ही तरीका है की मारो काटो कब्ज़ा करो और अपना झंडा फहराओ.

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