बंगाल के बाद यूपी में भी BJP की करारी हार : संपादकीय

दोस्तों बंगाल चुनाव में मिली हार के बाद.बीजेपी नेता एक दूसरे के कंधे पर सिर रखखर ठीक से रो नहीं पाए थे कि उससे पहले उत्तर प्रदेश में बीजेपी की हार की बहुत बुरी खबर आ गई है…बंगाल चुनाव हारने के बाद यूपी के पंचायत चुनाव में भी बीजपी को हार का सामना करना पड़ा है..आजतक जैसे न्यूज चैनल ने बीजेपी की हार पर लिखा अयोध्या काशी मथुरा तीनों जगह धराशायी हुई बीजेपी..जागरण लिखता है… बीजेपी को अयोध्या के बाद काशी मथुरा में भी झटका..

उत्तर प्रदेश में जितने भी हिंदू वोटरों वाले जिले बीजेपी के गढ़ माने जाते हैं..या फिर आध्यात्मिक तौर पर जिन जिलों पर बीजेपी ज्यादा फोकस कर रही थी..उन जिलों में बीजेपी के हाथ हार लगी है..अब तक के आंकड़ों के मुताबिक पूरे यूपी में बीजेपी नंबर दो पर दिखाई दे रही है..और सबसे बड़ी बात बीजेपी से ज्यादा निरद्लीय प्रत्याशी जीते हैं..खैर हम बात बड़े जिलों की करेंगे जिनमें बीजेपी की पैठ थी वहां कैसे बीजेपी को हार मिली वो देख लीजिए…अयोध्या.. वाराणसी..मथुरा..लखनऊ बीजेपी को जनता ने हरा दिया है और खुद योगी के गोरखपुर में एक सीट से हारते हारते बचे हैं..

 दोस्तों कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश में हुए पंचायत चुनाव 2022 के सेमीफाइनल हैं..लेकिन इस सेमीफाइनल में वोटरों ने बीजेपी को पसंद नहीं किया है..हालत ये है कि अयोध्या में समाजवादी पार्टी ने 40 में से 24 सीटें जीतीं बीजेपी को सिर्फ 6 सीटें मिलीं..बनारस में जिला पंचायत सदस्य की 40 सीटों पर सपा ने 14 सीटें जीतीं बीजेपी को सिर्फ आठ सीटें मिलीं..मथुरा में मायावती की बसपा ने 12 सीटें जीतीं और बीजेपी को केवल 9 सीटें मिलीं..

लखनऊ में जिला पंचायत की 25 सीटों में से सपा ने दस सीटें जीतीं और बीजेपी को केवल तीन सीटें मिलीं..योगी आदित्यनाथ के गोरखपुर की 68 सीट में से बीजेपी को 20 सीटें मिलीं..सपा गोरखपुर में बीजेपी से एक सीट कम रह गई..पंचायत चुनावों में बीजेपी की हालत बहुत मजबूत नहीं है..कहते हैं पंचायत चुनाव सत्ता का चुनाव होता है लेकिन बड़े बड़े जिलों में..बीजपी की हार पार्टी के लिए खतरे की घंटी है..

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          जो लोग बीजेपी और उत्तर प्रदेश की राजनीति को बहुत बारीकी से समझते हैं वो दो चीजें  बताते हैं कि पहली चीज कि सत्ता होते हुए भी बीजेपी की पंचायत चुनाव में हालत इतनी खराब है तो आगे इसे अलार्मिंग सिचुएशन की तरह लिया जाना चाहिए..दूसरी चीज ये है कि पंचायत चुनाव टोटल ग्रामीण इलाकों का चुनाव है..और बीजेपी का ज्यादातर वोटर शहरी है..इसलिए बीजेपी को चिंता करने की जरूरत नहीं है..

लेकिन मेरा मानना है कि बीजेपी को चिंता करने की जरूरत है..क्योंकि जब तक बीजेपी शहरी पार्टी थी तब तक उसकी यूपी में सरकार भी नहीं थी..जब गांवों तक पहुंची तभी योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने हैं लेकिन गांवों से बीजेपी के लिए खतरे की घंटी बजने लगी है..कोरोना महामारी में केंद्र सरकार से लेकर यूपी सरकार तक की नाकामी ने लोगों को बहुत निराश किया है जिसका रिजल्ट यूपी पंचायत चुनाव में बड़े शहरों में बीजेपी को हार के तौर पर देखने को मिला है..ये हार बताती है कि बीजेपी से यूपी की जनता खास तौर पर ग्रामीण जनता खुश नहीं है..चलते हैं राम राम दुआ सलाम..जय हिंद..

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DISCLAMER- लेख में प्रस्तुत तथ्य/विचार लेखक के अपने हैं. किसी तथ्य के लिए ULTA CHASMA UC उत्तरदायी नहीं है. लेखक एक रिपोर्टर हैं. लेख में अपने समाजिक अनुभव से सीखे गए व्यहवार और लोक भाषा का इस्तेमाल किया है. लेखक का मक्सद किसी व्यक्ति समाज धर्म या सरकार की धवि को धूमिल करना नहीं है. लेख के माध्यम से समाज में सुधार और पारदर्शिता लाना है.

2 thoughts on “बंगाल के बाद यूपी में भी BJP की करारी हार : संपादकीय

  • June 10, 2021 at 4:39 pm
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    #लखीमपुर_खीरी

    उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के धौरहरा क्षेत्र में बाढ़ में बह गए एक पुल को दो दशक बाद भी नहीं बनवाया जा सका है। इस पुल के न होने से उस पार बसे दर्जनों गांवों की करीब पचास हजार की आबादी अपरोक्ष रूप से प्रभावित है। धौरहरा क्षेत्र में पण्डित पुरवा-सुजईकुण्डा मार्ग पर बह रहे दहोरा नाले के उस पार बसे दर्जनों गांवों के निवासियों को तहसील और जिला मुख्यालय आने के लिए कुछ मिनटों की दूरी घंटों में तय करनी पड़ती है। लोग जान जोखिम में डालकर नाव से आवागमन करते हैं। आलम यह है कि यहां पर प्रशासन नाव भी उपलब्ध नहीं करवा रहा है। लोग प्राइवेट नाव से किराया देकर दहौरा नाले को पार कर रहे हैं।

    #पुल_न_होने_के_चलते_नाव_से_नाला_पार_करते_हैं_गांववाले

    1986 में बनवाया गया पुल कुछ समय बाद टूटा
    सन् 1986 में बाबू बनारसी दास के मुख्यमंत्री रहते यहां से विधायक रहे तेजनरायन त्रिवेदी के प्रयासों से पांच लाख की लागत से पंडित का पुरवा-सुजई कुण्डा मार्ग पर दहोरा नाले पर लगभग 30 मीटर लंबे पुल का निर्माण कराया गया था। तब से करीब दस वर्ष तक लगभग दो दर्जन गांवों की 50 हजार आबादी के अलावा धौरहरा कस्बे और आसपास के लोग अपना सफर तय करते थे। 1996 में बाढ़ आई और पानी की धारा ने हल्की करवट ली और इसकी दीवारें धराशायी हो गईं। क्षेत्रीय लोगों के प्रयास से सन् 1997 में जिला पंचायत अध्यक्ष रही लीला देवी ने मरम्मत के लिए सवा लाख रुपये उपलब्ध करवाए। प्राप्त धन और ग्रामीणों के श्रमदान से 1997-1998 में मरम्मत करवाई गई और क्षेत्रीय लोगों का आवागमन बहाल हो गया। फिर 2002 में आई भीषण बाढ़ ने पुल का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया।

    दो दर्जन से ज्यादा गांव वालों को होती है परेशानी
    पुल के धराशायी होने के कारण यहां के पंडित पुरवा, मगरौली, लहसौरी पुरवा, टापर पुरवा, घोसियाना, सुजई कुण्डा,नज्जापुरवा, भटपुरवा, धारीदासपुरवा, हरसिंहपुर, सुनारनपुरवा, बिन्जहा, मगरौली, फुटौहापुरवा सहित करीब दो दर्जन गांवों का सीधा संपर्क बरसात में तहसील मुख्यालय से समाप्त हो गया है। ग्रामीण जान जोखिम में डालकर नाव से अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने तहसील मुख्यालय आते हैं।

    लोग पुल के टूटने के पीछे निर्माण की तकनीकी खामियों को मुख्य वजह बताते हैं। फिलहाल पुल के पुन: वजूद में आने की दरकार है क्योंकि धौरहरा जाने के लिए लोगों को अब दो किलोमीटर की जगह बीस किलोमीटर या फिर नदी पार करके जान जोखिम में डालकर यह दूरी तय करनी पड़ती है। इससे लगभग पचास हजार आबादी मूल सुविधाओं से दूर है
    जब वोटिंग का समय आता है। तो जो भी प्रतिनिधि आता है उससे कहा जाता है तो वह यह आश्वासन देकर जाता है कि हम अगर विजई हुई है तो इस पुल का निर्माण अवश्य करवाएंगे फिर जब वह जीत जाता है फिर उस पुल की तरफ नजर भी उठा कर नहीं देखता है मैम मैं आपकी हर वीडियो देखता हूं आज मेरे मन में अचानक एक सोच जगी कि क्यों ना मैम के जरिए इस बात को सरकार तक पहुंचाया जाए कृपया मैम आप हम सबकी मदद करिए और इस आवाज को जन जन तक पहुंच जाइए
    Plz maem 🙏🙏🙏🙏

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    • June 11, 2021 at 3:33 pm
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      जरूर….नोटेड..

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