पैरालंपिक खेलों की शुरुआत कब हुई ? भारत ने 2 गोल्ड सहित 10 मेडल जीते…

भारत की पैरालंपिक Paralympics टीम इस समय जापान की राजधानी टोक्यो में अपनी नई चुनौतियों से भिड़ रही है और बेहतरीन प्रदर्शन कर देश का नाम भी रौशन कर रही है. पैरालंपिक Paralympics खेल 25 अगस्त से शुरू हो चुका है जो 5 सितंबर तक चलेंगे.

Tokyo Paralympics athletics india
Tokyo Paralympics athletics india

54 खिलाड़ी पैरालंपिक Paralympics खेलों में शामिल

इस बार भारत के 54 खिलाड़ी पैरालंपिक Paralympics खेलों में भाग ले रहे हैं और उम्मीद की जा रही है कि इस बार भारत अपना सबसे श्रेष्ठ प्रदर्शन करने में कामयाब होगा. ऐसा दिख भी रहा है टोक्यो पैरालंपिक में भारत के पदकों की संख्या 10 तक पहुंच गई है. भारत ने पहली बार किसी पैरालिंपिक Paralympics या ओलिंपिक में 10 मेडल जीते हैं. भारत ने 1972 में पहली बार इन खेलों में हिस्सा लिया था. अब तक के इतिहास में भारत ने केवल 12 पदक पैरालंपिक में हासिल किए थे.

ऊंची कूद स्पर्धा में भारत को तीन पदक

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पैरालंपिक Paralympics खेल के सांतवें दिन पुरुषों की ऊंची कूद स्पर्धा में भारत को दो पदक मिले हैं. यहां टी-63 स्पर्धा के फाइनल में मरियप्पन थंगावेलू ने सिल्वर और शरद कुमार ने ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किए. मरियप्पन थंगावेलु ने इससे पहले रियो 2016 में गोल्ड पर कब्जा किया था, लेकिन इस बार उन्हें सिल्वर से संतोष करना पड़ा. वहीँ इससे पहले भारत के निषाद कुमार ने रविवार को पुरुषों की ऊंची कूद टी47 स्पर्धा में एशियाई रिकॉर्ड के साथ रजत पदक जीता था. निषाद ने 2019 में दुबई में वर्ल्ड पैरा ऐथलेटिक्स ग्रांड फ्री में 2.05 मीटर हाई जंप लगाकर गोल्ड मेडल जीता था. इसी के साथ उन्होंने टोक्यो पैरालिंपिक का टिकट भी हासिल किया था.

जैवलिन थ्रो में भारत को दो मेडल

शूटिंग स्पर्धा में भारत के सिंहराज ने ब्रॉन्ज मेडल जीता. उन्होंने पुरुषों के 10 मीटर एयर पिस्टल SH1 के फाइनल में तीसरा स्थान हासिल किया. इससे पहले सोमवार को देवेंद्र झाझरिया और सुंदर सिंह गर्जुर ने जैवलिन थ्रो में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए भारत के खाते में दो मेडल डाल दिए हैं. देवेंद्र झाझरिया ने रजत तो सुंदर सिंह ने कांस्य पदक जीता है. देवेंद्र ने 64.35 मीटर और सुंदर सिंह ने 64.01 मीटर दूर भाला फेंका.

शूटिंग में भारत को गोल्ड मेडल

राजस्थान के चुरु जिले के देवेंद्र झाझरिया ने इससे पहले रियो पैरालंपिक- 2016 में गोल्ड मेडल जीता था. उनके नाम भारत की ओर से पैरालंपिक Paralympics में दो बार गोल्ड जीतने का रिकॉर्ड दर्ज है. अवनि लखेरा ने शूटिंग में गोल्ड मेडल जीता. 19 साल की इस शूटर ने महिलाओं के 10 मीटर एयर राइफल के क्लास एसएच1 में पहला स्थान हासिल किया. योगेश कथुनिया ने भारत को डिस्कस थ्रो में सिल्वर मेडल दिलाया. महिला टेबल टेनिस खिलाड़ी भाविनाबेन पटेल ने रजत पदक जीते.

पैरालंपिक Paralympics क्या है ?

कुछ लोग सोचते है कि ओलंपिक है तो पैरालंपिक Paralympics क्यों खेल रहे हैं. तो हम आपको बतादें कि ओलंपिक खेलों में नॉर्मल लोग खेलते हैं और पैरालंपिक Paralympics में जो शारीरिक रूप से दिव्यांग होते हैं उन्हें पैरालंपिक में खेलने का मौका दिया जाता है. जिस तरह ओलंपिक खिलाड़ियों का वज़न और लिंग के आधार पर वर्गीकरण किया जाता है, उसी तरह पैरा खिलड़ियों में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि उनकी शारीरिक स्थिति उनके खेल को किस हद तक प्रभावित कर रही है, यही उनकी श्रेणी को तय करता है. किसी खिलाड़ी को ‘पैरा खिलाड़ी’ माना जाएगा या नहीं, इसके 10 मानदंड होते हैं-

1) मांसपेशियों की दुर्बलता
2) जोड़ों की गति की निष्क्रियता
3) किसी अंग में कोई कमी
4) टांगों की लम्बाई में फ़र्क़
5) छोटा क़द
6) हाइपरटोनिया यानी मांसपेशियों में जकड़न
7) शरीर के मूवमेंट पर नियंत्रण की कमी
8) एथेटोसिस यानी हाथ-पैरों की उँगलियों की धीमी मंद गति
9) नज़र में ख़राबी
10) सीखने की अवरुद्ध क्षमता

सभी खेलों को दो भागों में बांटा गया है. एफ़ यानी फ़ील्ड की प्रतियोगिताएं जैसे शॉटपुट, जेवलिन थ्रो, डिसकस थ्रो. इसमें भी विकलांगता के हिसाब से लगभग 31 श्रेणियाँ होती हैं. वहीं दूसरा टी यानी ट्रैक की प्रतियोगिताएँ- जैसे रेस और जंप. इसमें 19 श्रेणियाँ होती हैं. इसके अलावा, तीरंदाज़ी, बैडमिंटन, साइकिलिंग, निशानेबाज़ी, ताइक्वांडो, जूडो और चार व्हीलचेयर के खेल (बास्केटबॉल, रग्बी, टेनिस और फ़ेंसिंग) भी पैरालंपिक Paralympics में शामिल हैं.

क्यों खेला जाता है पैरालंपिक Paralympics ?

इन खेलों के मौजूदा स्वरुप की शुरुआत 1948 में दूसरे विश्व युद्ध के बाद घायल सैनिकों को मुख्यधारा से जोड़ने के मकसद से हुई. खास तौर पर स्पाइनल इंज्यूरी के शिकार सैनिकों को ठीक करने के लिए इस खेल को शुरू किया गया. भारत में पिछले कई सालों से पैरा खिलाड़ियों को दी जाने वाली सुविधाओं में काफ़ी सुधार हुआ है, लेकिन चुनौतियाँ और संसाधनों की कमी अब भी है. जिन केंद्रों में सामान्य ख़िलाड़ी अभ्यास करते हैं, उन्हीं स्टेडियमों में पैरा ख़िलाड़ी भी अपने विशेष प्रशिक्षकों के साथ तैयारी करते हैं.

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