कोरोना वैक्सीन: रूस ने सारे ट्रायल पूरे किये, सितंबर तक बाजार में आ सकती है वैक्सीन

कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने को लेकर पूरी दुनिया में होड़ मची है. सभी देश ट्रायल में लगे हुए हैं. भारत ने 15 अगस्त तक कोरोना वैक्सीन तैयार करने की बात कही थी. लेकिन इस बीच रूस के सेचेनोव यूनिवर्सिटी ने एक बड़ी खबर दे दी है.

russia university sechenov clinical trials coronavirus vaccine
russia university sechenov clinical trials coronavirus vaccine

रूस के सेचेनोव यूनिवर्सिटी ने ये दावा किया है कि वो दुनिया की सबसे पहली कोरोना वैक्सीन तैयार करने में सबसे आगे है. इस वैक्सीन का नाम Gam-COVID-Vac Lyo रखा गया है. यूनिवर्सिटी ने बताया है कि इंसानों पर इस वैक्सीन का ट्रायल सफल रहा है. हमारा मकसद इंसानों को सुरक्षा देने के लिए कोविड-19 की वैक्सीन को सफलतापूर्वक तैयार करना था. सुरक्षा के लिहाज से वैक्सीन की जांच की जा चुकी है

सेचनोव यूनिवर्सिटी के डायरेक्टर अलेक्जेंडर लुकाशेव का कहना है कि अगर सारी परमिशन मिल जाती है तो ये वैक्सीन सितंबर तक बाजार में उपलब्ध होगी. पहले और दूसरे का वैक्सीन ट्रायल पूरा हो गया है. ये वैक्सीन वायरस से लड़ने के लिए शरीर की इम्युनिटी को बढ़ाएगी और उसे लम्बे समय तक बरकरार रखेगी. अलेक्जेंडर का दावा और गारंटी है कि वैक्सीन अगले दो साल तक कोरोना से बचाएगी.

पहले चरण का ट्रायल 18 से शुरू हुआ था जिसमें 18 वॉलंटियर शामिल हुए थे. वहीं, दूसरे चरण के ट्रायल की शुरुआत 23 जून को हुई थी जिसमें 20 वॉलंटियर्स को वैक्सीन दी गई थी. 13 जुलाई को दूसरे समूह के वॉलंटियर्स में वैक्सीन का दूसरा हिस्सा इंजेक्ट किया गया है. जो इन्हें लम्बे समय तक इम्युनिटी देंगे. दूसरे समूह में शहर के नागरिकों को शामिल किया गया है.

रूस को क्लीनिकल ट्रायल के बाद दवा को कोविड-19 के मरीजों पर इलाज के लिए अनुमति मिल गई है. कम्पनी का दावा है कि कोरोनाविर वायरस के रेप्लिकेशन (वायरस की संख्या बढ़ना) को रोकती है.

वहीं भारत में कोरोना की पहली वैक्सीन ‘कोवैक्सीन’ को हैदराबाद की फार्मा कंपनी भारत बायोटेक ने तैयार किया है. इसे आईसीएमआर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, पुणे के साथ मिलकर बनाया गया है. जानवरों पर इसका ट्रायल कामयाब रहा है. इंसानों पर परीक्षण के लिए इसे हाल ही में मंजूरी मिली है. ये ट्रायल इसी महीने शुरू हो रहे हैं.

कैसे होता है ट्रायल-

पहली बात की हर कोई ट्रायल में शामिल नहीं हो सकता, इसके लिए कई शर्तें होती हैं. आपके हेल्थ की जांच भी होती है. जो ट्रायल के लिए तैयार होते हैं वैज्ञानिक उन्हें पहले बीमारी और उसके वर्तमान में चल रहे इलाज के बारे में बताते हैं. साथ ही नए परीक्षण की पूरी जानकारी दी जाती है कि ट्रायल में क्या होगा और शरीर पर कैसा असर हो सकता है. इसके बाद लोगों से सहमति पत्र साइन किया जाता है और फिर ट्रायल की शुरुआत होती है. इसमें लगातार आपकी निगरानी होती है.

ट्रायल शुरू करते समय एकदम से ज्यादा लोगों को लेकर ट्रायल नहीं होता, पहले छोटे समूह पर जांच होती है. इसमें भी तीन चरण होते हैं. पहला चरण फेज जीरो होता है. इसमें 11 से 15 व्यक्ति को ट्रायल में शामिल कर दवा या वैक्सीन का डोज काफी कम मात्रा में दिया जाता है, सिर्फ ये जांचने के लिए कि कहीं इसका कोई खतरनाक असर तो नहीं हो रहा. अगर असर ठीक न दिखता तो ट्रायल रोक दिया जाता है और वैज्ञानिक दोबारा रिसर्च करते हैं.

फिर दूसरे चरण फेज 1 के दौरान लगभग 20 से 80 लोगों पर जांचकर्ता कई महीनों तक दवा के प्रभाव को देखते हैं. इस स्टेप का मकसद इस बात की जांच करना है कि दवा या वैक्सीन की ज्यादा खुराक या कितनी ज्यादा खुराक ली जाए, जिसका शरीर पर कोई साइड इफेक्ट न हो. इसी फेज में ये तय होता है कि दवा को कैसे दिया जाए, जिससे वो ज्यादा असर करे यानी सीरप के रूप में, कैप्सूल की तरह या फिर नसों के जरिए.

तीसरे चरण यानी फेज 2 ट्रायल तीनों चरण की सफलता के बाद ही दवा आगे प्रोसेस होती है. इसके बाद दवा सुरक्षित मान ली जाती है. हालांकि इसके बाद भी एक स्टेप होता है. इसमें पक्का किया जाता है कि दवा सेफ है और उसका असर मौजूदा दवा से ज्यादा नहीं होगा तो कम भी नहीं होगा.

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