ध्वस्त सिस्टम चीखपुकार हाहाकार..वो कहते हैं चंगी है सरकार : संपादकीय

जनता का छोड़ दीजिए..खुद मुख्यमंत्री क्वारेंटीन हैं..पूर्व मुख्यमंत्री क्वारंटीन हैं..उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा अस्पातल में भर्ती हैं..लखनऊ का बीजेपी सांसद कहता है ऑक्सीजन नहीं दोगे तो धरना दूंगा..लखनऊ के बीजेपी विधायक की मौत हो चुकी है…केलव लखनऊ में ही सैकड़ों लोग मर गए हैं..और मुख्यमंत्री योगी की फाइल में मौसम बिल्कुल गुलाबी है..

योगी जी डंके की चोट पर कहती हूं..बेड की कमी है..कमी तो बहुत छोटा शब्द है..अस्पतालों में बेड खाली हैं ही नहीं..ऑक्सीजन का अकाल है..गाजियाबाद के अस्पताल ने तो माइक पर एनाउंसमेंट कर दी कि ऑक्सीजन खत्म हो गई है..अपना मरीज ले जाओ..रेमडीसिविर इंजेक्शन ऐसे गायब हैं जैसे गधे के सिर से सींघ..आप कहने को कुछ भी कहते रहिए..बड़ी बड़ी बातें बनाते रहिए..लेकिन माफ कीजिएगा जो सच है वो सच है..सरकार सही कहती है हमें मिलकर काम करना चाहिए और सरकार के भाषण से पहले हम लखनऊ के सारे पत्रकार दिन रात मिलकर काम कर रहे हैं..लखनऊ का एक एक पत्रकार एक एक दिन में कम से कम 10 लोगों की इलाज में मदद कर रहा है..चाहे वो जिस चैनल का हो..आपको इस पैनिक सिचुएशन के बारे में अब पता लगा है..आप कृतिम अभाव की बात करते हैं..जिसकी मां मर रही हो..डॉक्टर पर्चे पर रेमडीसिविर इंजेक्शन लिख दे..कह दे जाओ ले आओ..अपनी अम्मा की जान बचाओ..बच्चे मार्केट भागते जाते हैं..मार्केट में एक इंजेक्शन की कीमत 25 हजार बताई जाती है..जिसकी मां मर रही है क्या वो आपके सामने ज्ञापनन लेकर खड़ा होगा या पैसों की इंतजाम करके मां की जान बचाने भागेगा..वो अपनी मां की जान बचाए या आपकी सरकार की छवि बनाए..

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अगर आपको लोगों की इतनी चिंता है तो अपने डॉक्टरों से कहिए कि वो मरीजों से बाहर से इंजेक्शन खरीदने को ना कहें..आप दीजिए डॉक्टर को इंजेक्शन..आप क्यों नहीं देते हैं..अस्पतालों ने गेट पर लिखकर पर्चे लगा दिये कि ऑक्सीजन नहीं है..अपना सिलेंटर लेकर आईये..और आप कहते हैं बहुत ऑक्सीजन है..कौन बता देता है ये सब झूठी बातें आपको..कहीं बेड हैं तो ऑक्सीजन नहीं है..ऑक्सीजन हैं तो बेड नहीं हैं..पीजीआई और मेदंता अस्पताल से बाहर भी उत्तर प्रदेश है..सारे अस्पताल पीजीआई और मेदांता नहीं हैं..आप नेता हैं आप के लिए ये यूपी आपका ही है ना इस यूपी के राजा तो आप ही हैं ना…तो मैं लखनऊ की रिपोर्टर प्रज्ञा मिश्रा आपसे सवाल करती हूं..किसी की हिम्मत कैसे हो रही है कालाबाजारी करने की..चलिए मान लेते हैं..ऑक्सीजन की शॉर्टेज हो गई है..आपकी गलती नहीं भी है..शासन प्रशासन तो आपका है ना..कैसे जमाखोरों की हिम्मत कालाबाजारी करने की हो रही है..इसका मतलब तो यही है ना कि शासन के लोग कालाबाजारी में मिले हुए हैं..5 मेडिकल स्टोर पर पता कीजिए रेमेडिसिविर मिल जाएगा..लेकिन कीमत 25 हजार से कम नहीं मिलेगी..आप कहते हैं कृत्रिम यानी बनावटी अभाव बताया जा रहा है..तो क्या श्मसान में कृत्रिम लाशें पहुंच रही हैं…कफन खुलवाकर चेक कीजिए देखिए किसकी मां कृतिम है किसकी बेटी कृतिम है..किसका बाप कृतिम है..

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सर जिनका पति मर गया..जिसका बेटा मर गया..जिसकी बहन मर गई..जिसकी मां मर गई..जिसको अस्पताल नहीं मिला ऑक्सीजन नहीं मिली..दवाई नहीं मिली..श्मसान नहीं मिला..वो आपका आपकी सरकार का आपके सिस्सटम का गुण कैसे गाए..आप बता दीजिए कोई ऐसा टीका जिसको लगाने के बाद चीख मंगल गान में बदल जाएं..तो तड़पते उत्तर प्रदेश को वो वही टीका लगा दिया जाए जिससे हाहाकार चीत्कार चीख पुकार..जलती लाशें…शुभ का संकेत मान ली जाएं..जब फोन पर दूसरी तरफ कांपती आवाज में कोई ये कहता है मां की हालत बहुत खराब है..एक बेड दिला दीजिए.. तो पैनिक भी होता है नकारात्मकता भी आती है..जब कोई एक रेमिडिसिविर के लिए गिड़गिड़ाता है तो पैनिक भी होता है और नकारत्मकता भी आती है..जब कोई फोन पर एक ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए चीख चीखचीख कर रोता है..तो नकारात्मकता आ जाती है..आप क्या जानें क्या हो रहा है उत्तर प्रदेश में आपको क्या मालूम कि उत्तर प्रदेश के लोगों ने मान लिया है कि उनकी मौत आज नहीं तो कल हो जाएगी..आपको तो वही मालूम है जो फाइलों में लिखकर आपको दे दिया गया है..अगर आपको लगता है कि मैं लखनऊ की पत्रकार प्रत्रा मिश्रा झूठ बोल रही हूं..तो बैठिए मेरे साथ ऑटो में और मैं आपको लखनऊ घुमा देती हूं..आप जिसे कृत्रिम कहते हैं उसका हाल दिखा देती हूं..चुनौती देती हूं कि अगर आपकी आंखों में आंसू ना आ जाएं तो पत्रकारिता का पेशा छोड़ दूंगी..

DISCLAMER- लेख में प्रस्तुत तथ्य/विचार लेखक के अपने हैं. किसी तथ्य के लिए ULTA CHASMA UC उत्तरदायी नहीं है. लेखक एक रिपोर्टर हैं. लेख में अपने समाजिक अनुभव पर आधारित है. लेखक का मक्सद किसी व्यक्ति समाज धर्म या सरकार की धवि को धूमिल करना नहीं है. लेख के माध्यम से समाज में सुधार और पारदर्शिता लाना है.