मोदी (Modi Ji) के लिए बनारस में कैमरों की बाढ़ जौनपुर में अखिलेश के लिए नो स्पेस : संपादकीय व्यंग्य

PRAGYA KA PANNA
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वाराणसी से जौनपुर की दूरी है 60 किमी..वारणसी में तीन दिन के लिए मोदी थे..और जौनपुर में 2 दिन के लिए अखिलेश यादव रथ यात्रा निकाल रहे थे..वाराणसी में काशी कॉरीडोर का उद्घाटन मोदी जी (Modi Ji) ने किया..मेरा तो घर की बनारस में बाबा विश्वनाथ मंदिर के पास है..मुझे लगता है सोनी कैनन पैनासनिक और निकॉन ने आज तक जितने कैमरे बनाकर भारतीय मीडिया को बेचे होंगे वो सब यहां थे..मोदी जी के एक एक मूव का शॉट था..उनकी एक एक सांस का वीडियो था..

मोदी जी ने एक दिन में चार बार कपड़े बदले..कितनी बार कैमरे को घूरा..मजदूरों पर फूल लुटाए..या गरीबों के साथ खाना खाया इस पर बात नहीं करूंगी..मोदी जी देश के प्रधानमंत्री हैं..भारत में चार मीडिया घराने हैं..चारों मोदी जी के चरणों में चारों पड़े हैं..तो उनके कैमरे तो मोदी जी के सम्मान खड़े ही होंगे..इसमें कोई बड़ी बात नहीं है..आज मैं बात करने जा रही हूं..बनारस और जौनपुर के बीच 60 किमी के फासले की..क्योंकि ये फासला 2022 में यूपी में जीत का फासला तय करेगा..

मोदी जी (Modi Ji) से केवल 60 किमी की दूरी पर अखिलेश यादव रथ यात्रा निकाल रहे थे..अखिलेश यादव की रथ यात्रा में लोग कहां से आ रहे थे..कौन ला रहा था..इसका मेरे पास कोई डॉक्यूमेंट नहीं है..लेकिन लोग जहां से भी आ रहे थे..अगर ये बीजेपी सरकार से नाराजगी के कारण उत्पन्न नजारा है..तो ये 2022 में बीजेपी के लिए अलार्मिंग सिचुएशन है..एक तरफ मोदी जी के लिए असंख्य कैमरे और देश की मीडिया पलक पावड़े बिछाकर बैठी थी वहीं..

मोदी जी से 60 किमी दूर मोदी जी को छोड़ अखिलेश जी के लिए मड़ता सैलाब दिखाने में देश की मीडिया डर रही थी..अखिलेश यादव की रैली में नुमाइंदे सभी चैनलों के थे..लेकिन अखबारों और टीवियों पर अखिलेश के लिए स्पेस नहीं था..मेरे घर में जो अखबार आता है..उसमें मोदी जी का बनारस दौरा 7 पेजों पर था..ये देखिए पहला दूसरा तीसरा चौथा..पांचवां..छठा और सातवां..अखिलेश की रथ यात्रा एक कोने में थी..

अखबार और टीवी तो चलते ही एड विज्ञापनों और सत्ता के सहारे हैं..अखिलेश यादव को गितनी के कुछ रीजनल चैनल और कुछ यूट्यूब चैनलों ने दिखाया..लेकिन अखिलेश यादव भी छोटे चैनलों और छोटे (Modi Ji) अखबारों को भाव नहीं देते..वो वहां जगह चाहते हैं वहां उनको जगह नहीं मिलती..अखिलेश यादव की यात्रा में सैलाब तो बहुत उमड़ रहा है..इसमें कोई शक नहीं है..और जिस तरह से सैलाब उमड़ रहा है..अगर ये सत्ता विरोधी जन सैलाब है..और ये भीड़ वाकई बदलाव चाहती है..

तो यूपी में अखिलेश के लिए शुभ संकेत हैं..और अगर ये मैनेज्ड भीड़ है..और भीड़ दिखाकर माहौल सेट करने वाला मसला है..तो समाजवादी पार्टी को सोचने की जरूरत पड़ेगी..डिजिटल माध्यमों से दिख रही तस्वारों से नजर आता है कि लोग दिसंबर की रात में रात के 9 बजे तक अखिलेश का सड़कों पर खड़े होकर स्वागत कर रहे हैं..अगर ये स्वागत वाले लोग वोटिंग लाइन में भी इसी तरह का स्वागत करेंगे तो बीजेपी की यूपी में वापसी बहुत मुश्किल होगी..

समाजवादी पार्टी ने पश्चिमी यूपी जयंत चौधरी के हवाले छोड़ रखा है..जिन लोगों को जयंत चौधरी के भीतर जाट और मुसलमानों को एक साथ रखने की कुवत नजर आती है..वो लोग राजनीति को दूसरे नजरिए से समझते होंगे…लेकिन मुझे नहीं लगता किसान आंदोलन समाप्ति के बाद जयंत चौधरी के लिए पश्चिमी यूपी को संभाले रखना बहुत आसान होगा..(Modi Ji) क्योंकि जब राष्ट्रीय लोकदल का अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन जयंत जी के पिता जी के जीवनकाल में 16 सीटें जीतेने का रहा है..

मैं लखनऊ की पत्रकार हूं..ग्राउंड पर रहती हूं…बहुत कुछ सुनती देखती और समझती हूं..पश्चिमी यूपी के 26 जिलों में 136 सीटें हैं..मैं नहीं मानती कि किसान आंदोलन खत्म होने के बाद पश्चिमी यूपी में जयंत और अखिलेश मिलकर बहुत बड़ा उलटफेर कर पाएंगे..लोगों के जहन से मुजफ्फरनगर दंगों की बुरी यादें मिटा पाएंगे..हिंदू मुसलमान के बीच की खाई को भर पाएंगे..सरकार से जीतकर आए किसानों के भरोसे पश्चिमी यूपी की राजनीति नहीं की जा सकती..किसानों की मांगे मान ली गई हैं..किसान सतुष्ट होकर लौटे हैं..ऐसे स्थिति में किसानों के भरोसे राजनीति सपा और जयंत के लिए कितनी सहायक होगी ये तो वक्त बताएगा..

Disclamer- उपर्योक्त लेख लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार द्वारा लिखा गया है. लेख में सुचनाओं के साथ उनके निजी विचारों का भी मिश्रण है. सूचना वरिष्ठ पत्रकार के द्वारा लिखी गई है. जिसको ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है. लेक में विचार और विचारधारा लेखक की अपनी है. लेख का मक्सद किसी व्यक्ति धर्म जाति संप्रदाय या दल को ठेस पहुंचाने का नहीं है. लेख में प्रस्तुत राय और नजरिया लेखक का अपना है.

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