Maharastra में सरकार किसी की भी बने असली सत्ता शरद पवार की बेटी को मिल गई

देखिए मैं हमेशा ये जानने की कोशिश करती हूं कि किसी भी राजनीतिक हलचल या सामाजिक परिवर्तन को आम आदमी कैसे स्वीकार कर रहा है. कैसे उस पर रिएक्ट करता है. उसका अपना जरिया क्या है. क्या उसका नजरिया वो है जो टीवी पर एंकर का है. क्या उसका नजरिया वो है जो किसी प्रवक्ता का होता है. और यकीन मानिए 99% शहरी लोगों से बात करते हुए ऐसा लगता है मैं किसी आम आदमी से नहीं पार्टी के प्रवक्ता से बात कर रही हूं. कुछ ही लोग ऐसे मिलते हैं जो पक्ष और विपक्ष दोनों की कमियां बताते हैं.

इस बार महाराष्ट्र में चल चल रहे सियासी नाटक के बारे में लोगों से प्रतिक्रिया ली तो लोगों ने इसे बीजेपी की चालाकी का सबूत बताया किसी ने कहा बीजेपी ने गलत किया किसी ने कहा कांग्रेस और शिवसेना वाले बच्चे हैं. इतने  लोगों के नजरिए के बीच मेरा भी एक नजरिया है. लोग कहते हैं एनसीपी से अजित पंवार अलग हो गए चाचा शरद पवार को धोखा दिया. लेकिन ये धोखा शरद पवार के  लिए मेरे नजरिए में मजा है. अजित पंवार ये कभी नहीं कर पाते जो अजित पवार ने कर दिया है. शरद पवार का सारा धर्म संकट खत्म हो चुका है.

जो लोग ये सोच रहे हैं कि अजित पवार के जाने से शरद पवार को झटका लगा है वो लोग गलत हैं. क्योंकि बहुत समय से अजित पवार और शरद पवार के बीच नहीं बन रही थी. वैसे तो अजित पवार शरद पवार के भतीजे हैं लेकिन अजित पवार को लगता था कि चाचा शरद पवार उनको आगे नहीं बढ़ा रहे हैं. अजित पवार ने शरद की मर्जी के खिलाफअपने बेटे पार्थ को लोकसभा का चुनाव भी लड़ाया वो हार गया..शरद पवार ने अपने दूसरे भाई के बेटे रोहित को विधानसभा से चुनाव लड़वाया और जिता लिया.

 

अजित पवार को लगता था कि शरद पवार उनके बेटे और उनको आगे नहीं बढ़ने देना चाहते और इसीलिए पार्टी से विधायक लेकर डिप्टी सीएम का पद लेकर फडणवीस को सीएम बनवा दिया. अब इसका दूसरा पहलू देखिए अजित पवार के जाने से शरद पवार की पार्टी में सारे कांटे अपने आप साफ हो चुके हैं सुप्रिया सुले अब शरद पवार की एकलौती सगी औलाद ही वारिस बची हैं. अजित पवार ने अपने सभी रास्ते बंद कर लिए हैं. महाराष्ट्र की राजनीति ने दिखा दिया है कि उसूलों की राजनीति खत्म हो चुकी है. हिंदूवादी शिवसेना कांग्रेस एनसीपी के साथ जाने को तैयार थी. बीजेपी भ्रष्टाचारियों से हाथ मिला चुकी है. एनसीपी और कांग्रेस को कट्टर हिंदूवादी शिवसेना के साथ जाने में कोई तकलीफ नहीं थी. शरद पवार की पार्टी एनसीपी अब असल मायनों में मजबूत होगी. सकार किसी की भी बने लेकिन असल लॉटरी शरद पवार की लगी है. 

नोट- ये लेख प्रज्ञा जी की  निजी सोच और ग्राउंड रिपोर्टिंग करते हुए अनुभवों का हिस्सा है.

 

 

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