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लखनऊ के बाद अब कानपुर-उन्नाव में लगा लाशों का ढेर, गंगा किनारे डरावने हालात

कोरोना की इस दूसरी लहर में मरने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है. लखनऊ में इसका भयानक नज़ारा पूरा देश देख चुका है. वैसे ही हालात अब कानपुर-उन्नाव में भी देखने को मिल रहे हैं. यहाँ श्मशान घाटों पर अब चिताओं के लिए लकड़ियां कम पड़ने लगी हैं.

शवों को दफन करना पड़ रहा

हालात इतने बदतर हो गए हैं कि मजबूरन लोगों को हिंदू रीति-रिवाज और परंपरा छोड़कर शवों को दफन करना पड़ रहा है. कानपुर और उन्नाव के शुक्लागंज में गंगा किनारे का काफी डरावना हाल है. यहां हर दूसरे कदम पर एक शव को दफन किया गया है. लाशें सिर्फ 3 फीट के गड्ढे में दफन की जा रही हैं. सामने आया है कि शवों को चिता पर आग देने की अपेक्षा दफन करना ज्यादा सस्ता पड़ रहा है. इसलिए बड़ी संख्या में लोग शवों को दफन करके चले जा रहे हैं.

नगर निगम की हैरान करने वाली रिपोर्ट

नगर निगमों की रिपोर्ट देखें तो हैरान हो जायेंगे. नगर निगम के अनुसार अकेले लखनऊ और कानपुर में करीब 25 हजार क्विंटल लकड़ी खरीदी जा चुकी है. ये स्थिति तब है जब कानपुर IIT समेत कई संस्थानों ने अपने यहां से निशुल्क लकड़ी उपलब्ध कराई हैं. दोनों शहरों को मिलाकर अप्रैल के महीने में 5,500 से ज्यादा लोगों का अंतिम संस्कार अब तक किया जा चुका है.

गांव में पहुंचा कोरोना

वहीं पंचायत चुनाव के बाद से कोरोना गांव तक भी पहुंच गया है. इसका असर भी दिखने लगे हैं. बुलंदशहर के परवाना गांव में पिछले दो हफ़्ते के भीतर 30 से ज़्यादा लोगों की मौत का दावा किया जा रहा है. ग्रामीणों का दावा है कि मरने वाले हर उम्र के हैं लेकिन बुज़ुर्गों की संख्या ज़्यादा है. ग्रामीणों का दावा है कि पंचायत चुनाव में लोग दिल्ली, ग़ाज़ियाबाद से वोट डालने के लिए गांव आए थे. यही कारण है कि गांव में संक्रमण फैल गया और लोग इसकी ज़द में आ गए.

खांसी-बुख़ार के मरीज़ों की संख्या लगातार बढ़ रही है. ग्रामीण स्तर पर ही लोग इलाज कर रहे हैं. हालत ज्यादा बिगड़ने पर अस्पताल ले जा रहे हैं लेकिन कई बार अस्पताल पहुंचते-पहुंचते देर हो जाती है और मरीज़ की मौत भी हो जा रही है.

लखनऊ में कम हुआ कोरोना का कहर

राहत की बात ये है कि लखनऊ के हालात अब काफी सुधर गए हैं. श्मशान घाटों पर लाशों का आना भी कम हो गया है और कोरोना के नए मामलों में भी भारी गिरावट आ गई है. अब लखनऊ में 12 से 15 सौ के आसपास केस मिल रहे हैं और एक्टिव मरीजों की संख्या भी तेजी से कम हो रही है. माना जा रहा है की मई के आखिर तक लखनऊ में सब पहले जैसा हो सकता है.

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