मोदी का गाजीपुर दौरा 2019 में पूर्वांचल बचाने की कोशिश है ?

2014 में वाराणसी से खुद नरेंद्र मोदी चुनाव जीते. साथ ही पूर्वांचल के 25 जिलों की 32 लोकसभा सीटों में से 31 पर बीजेपी ने जीत दर्ज की. केवल आजमगढ़ सीट रह गई जहां से समाजवादी पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव चुनाव जीते थे. 2014 में पूर्वांचल में बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस खाता भी नहीं खोल पाई.

 

-----

जीत की यही कहानी बीजेपी ने 2017 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी दोहराई. पूर्वांचल की 141 विधानसभा सीटों में से बीजेपी ने 111 सीटों पर कब्जा किया. समाजवादी पार्टी सिर्फ 14 सीट ही जीत सकी. जबकि बहुजन समाजवादी पार्टी को 12 सीटें मिली और कांग्रेस सिर्फ एक सीट जीतकर लाज बचा पाई.

2014 से काशी अब पूर्वांचल का प्रवेश द्वार बन गई है. इस प्रवेश द्वार पर पहरा है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जो खुद को प्रधानमंत्री नहीं देश का चौकीदार मानते हैं. गाज़ीपुर इसी वाराणसी से सटा शहर है. जो पूर्वांचल का गढ़ भी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी गाजीपुर में  हुंकार भरेंगे. माना जा रहा है कि पूर्वांचल के इस दौरे से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2019 आम चुनाव का एजेंडा सेट करेंगे. 

 

सौ. twitter- @narendramodi
सौ. twitter- @narendramodi

 

पूर्वांचल का राजनीतिक इलाका  25 ज़िलों में फैला है

  • बलरामपुर
  • गोंडा
  • फैजाबाद
  • अंबेडकर नगर
  • बहराइच
  • श्रावस्ती
  • सिद्धार्थनगर
  • बस्ती
  • संतकबीर नगर
  • गाजीपुर
  • वाराणसी
  • चंदौली
  • मिर्ज़ापुर
  • भदोही
  • सोनभद्र
  • जौनपुर
  • महाराजगंज
  • कुशीनगर
  • गोरखपुर
  • देवरिया
  • आजमगढ़
  • मऊ
  • अमेठी
  • सुल्तानपुर
  •  बलिया

 

पूर्वांचल का असर बिहार की सियासत पर भी होता है. लिहाज़ा हर पार्टी के लिए पूर्वांचल वोट का खजाना है. जिस पर कब्जे के लिए आने वाले दिनों में आप रैलियों का रेला देखेंगे. एक तरफ पश्चिमी उत्तर प्रदेश है. जो विकास की नई इबारत लिखता है.  दूसरी तरफ पूर्वी उत्तर प्रदेश है. जो तमाम सियासी दिग्गजों को पनाह देता है. लेकिन खुद को विकास की तेज़ रफ्तार से जोड़ नहीं पाता.

 

पूर्वांचल में इसी विकास के एजेंडे को नरेंद्र मोदी ने 2014 आम चुनाव में मुद्दा बनाया. जिसका नतीजा करीब-करीब सौ फीसदी सीटें जीतने के तौर पर आया. पूर्वांचल में 2014 लोकसभा चुनाव और 2017 की विधानसभा चुनाव में जीत का मतलब ये कतई नहीं है कि पूर्वांचल में बीजेपी का डंका बजता है.

 

जनता मूड कब बदल जाए. इसका अंदाज लगाने में चुनावी चाणक्य अमित शाह तक का गणित गड़बड़ा जाता है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की वजह से गोरखपुर लोकसभा सीट पूर्वांचल का पावर सेंटर है. लेकिन लोगों का मूड देखिए कि योगी जी के सीएम बन जाने के बाद गोरखपुर सीट बीजेपी से छिन गई. ‘नो इफ़ नो बट, गोरखपुर में ओनली मठ’ के नारे के बीच बीजेपी अपनी परंपरागत सीट नहीं बचा पाई. प्रतिष्ठा की इस सीट की हार का असर पूर्वांचल के दूसरी सीटों पर ना हो. इसीलिए मोदी फिर से 2019 की शुरुआत पूर्वांचल से करने वाले हैं

 

पूर्वांचल में बीजेपी के दो सहयोगी हैं. अनुप्रिया पटेल और उनके पति आशीष पटेल का अपना दल. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी. जिसके मुखिया हैं ओमप्रकाश राजभर. अपना दल के उत्तर प्रदेश विधानसभा में 9 सीटें हैं. और लोकसभा में दो सांसद.

 

ओमप्रकाश राजभर उत्तर प्रदेश में कैबिनेट मंत्री हैं. लेकिन ये दोनों फिलहाल बीजेपी से नाराज़ दिख रहे हैं. ये नाराज़गी सिर्फ टाइमिंग की हो सकती है कि बीजेपी से आम चुनाव के लिए ज़्यादा सीटों की मांग करें. बीजेपी इन दोनों के साथ कैसे निपटारा करेगी.

 

ये सवाल तो फिलहाल हवा में है. लेकिन पूर्वांचल की सियासत अगर जातिगत समीकरणों की पहचान है तो इन दोनों सहयोगी दलों को बीजेपी खोना नहीं चाहेगी.

 

यूपी के 16 जिले ऐसे हैं जहां पटेल मतदाताओं की तादाद 8 से 12 फीसदी के बीच है. यूपी के 8 लोकसभा और 32 विधानसभा सीटों पर पटेल यानी कूर्मी वोटर काफी निर्णायक भूमिका में हैं.

  • मिर्जापुर
  • प्रतापगढ़
  • सोनभद्र
  • कौशांबी
  • फूलपुर
  • प्रयागराज
  • संतकबीरनगर
  • बरेली
  • उन्नाव
  • जालौन
  • फतेहपुर
  •  कानपुर

तक पटेल मतदाताओं का प्रभाव है. ज़ाहिर है बीजेपी अपने पुराने साथी को नहीं छोड़ना चाहेगी. दूसरी  तरफ राजभर समाज है. जिसके वोट का असर मऊ, आजमगढ़, बलिया, गोरखपुर,  बस्ती, जैसे ज़िलों में है. माना जा रहा है इस राजभर वोट को साधने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गाज़ीपुर में कोशिश करेंगे.

 

जातिगत समीकरण के अलावा मोदी सरकार ने पूर्वांचल से किए कुछ वादे भी पूरे किए हैं. जैसे पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे का शिलान्यास.  बनारस में दिल्ली के एम्स से 50 बेड ज्यादा का ऐम्स बनाया जा रहा है. केंद्र में मंत्री और ग़ाज़ीपुर से सांसद मनोज सिन्हा की मानें तो 88 हजार करोड़ की योजनाएं पूर्वांचल में चल रही हैं, जिनमें से कुछ पूरी हो चुकी हैं.

 

दरअसल यूपी के बदले सियासी मिजाज के तहत बीजेपी के लिए पूर्वांचल को साधना काफी अहम हो गया है. शायद यही वजह है कि पीएम मोदी और अमित शाह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुकाबले पूर्वी उत्तर प्रदेश पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं.

 

बीजेपी की प्रदेश इकाई पूर्वांचल के कई जिलों में मोदी की रैलियां कराकर माहौल को अपने पक्ष में बनाने की कोशिश में जुट गई हैं. माना जा रहा है पीएम की हर महीने यूपी में एक रैली कराने का पार्टी ने प्लान बनाया है. पीएम मोदी का ग़ाज़ीपुर दौरा  उसकी शुरुआत है.

 

बीजेपी की इस रणनीति के सामने है समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठजोड़ . बुआ-बबुआ के गठजोड़ ने बीजेपी को उप-चुनाव में करारी शिकस्त दी थी. जिसे देखते हुए अब बीजेपी और चौकस है.

 

पूर्वांचल में पिछड़े वोट पर बीएसपी की नज़र होती है. समाजवादी पार्टी यहां के यादव और मुस्लिम वोटर्स को रिझाती है जबकि कांग्रेस का सूरज पूर्वांचल की इस ज़मीन पर फिलहाल अस्त है. लेकिन ये तस्वीर कांग्रेस के तीन राज्यों में जीत के बाद बदल भी सकती है.

 

समाजवादी पार्टी, बीएसपी और आरएलडी के संभावित गठजोड़ के बीच कांग्रेस एंट्री भी मार सकती है. यानी 2019 में विपक्ष महागठबंधन बनाकर उतरता है, तो बीजेपी के लिए 2014 जैसे नतीजे पूर्वांचल में दोहराना आसान नहीं होगा.

 

पूर्वांचल में बीजेपी की जीत का दोहराया जाना योगी आदित्यनाथ की भी सबसे बड़ी परीक्षा होगी. लोकसभा की 80 सीटों वालें उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने 2014 चुनाव में प्रचंड वोट हासिल किया था. लिहाजा ये अमित शाह और मोदी मैजिक का भी सबसे बड़ा इम्तिहान होगा