तीन में से कौन सी वैक्सीन लगवानी चाहिए.. आपको कौन सी सूट करेगी.. पढ़िये पूरा विश्लेषण-

कोरोना महामारी से बचने के लिए अब देश में तीन वैक्सीन लोगों को लगाईं जा रही हैं. तेजी से वैक्सीनेशन का काम चल रहा है लेकिन लोगों के मन में एक सवाल उठ रहा है की इन तीनों वैक्सीन में से कौन सी ज्यादा असरदार होगी ? तो आज हम इसी बारे में आपको पूरी जानकारी देंगे. इसके साथ ही DRDO ने जो कोरोना की दवा लाँच की है इसके बारे में भी सबकुछ बतायंगे. आइये समझते हैं-

कोवीशील्ड, कोवैक्सिन, स्पुतनिक V वैक्सीन

भारत में तीन वैक्सीन मौजूद हैं पहली- कोवीशील्ड, दूसरी- कोवैक्सिन तीसरी- स्पुतनिक V. दो वैक्सीन कोवीशील्ड और कोवैक्सिन पहले से ही लग रही हैं लेकिन अब स्पुतनिक V भी आ गई है. वैसे तो तीनों ही वैक्सीन कोरोना के गंभीर लक्षणों से बचाने और मौत टालने में 100% इफेक्टिव हैं. इसलिए दुनियाभर के वैज्ञानिक भी कह रहे हैं कि जो भी वैक्सीन उपलब्ध हो, उसका डोज लगवा लें. ये आपकी जान बचाने के लिए जरूरी है. लेकिन फिर भी तीनों वैक्सीन के बारे में सभी को जानना चाहिए.

कोवैक्सिन कहाँ की है किसने बनाई और कैसे बनाई ?

कोवैक्सिन को पूरी तरह से भारत में ही विकसित और बनाया जा रहा है. Covaxin एक इनऐक्टिवेटेड वैक्‍सीन है यानी ये किसी मृत कोरोना वायरस से बनाया गया है. इसके लिए भारत बायोटेक ने पुणे के नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ वायरलॉजी में आइसोलेट किए गए कोरोना वायरस के एक सैम्‍पल का इस्‍तेमाल किया है. इसलिए जब ये वैक्‍सीन लगाई जाती है तो इम्‍युन सेल्‍स मृत वायरस को पहचान लेती हैं और उसके खिलाफ ऐंटीबॉडीज बनाने लगती हैं.

भारत बायोटेक ने 3 मार्च को फेज-3 ट्रायल के नतीजे जारी किए थे. इसमें दावा किया गया था कि Covaxin ने 81% क्लिनिकल एफेकसी दिखाई है. ये वैक्‍सीन ट्रायल के दौरान सेफ पाई गई है और किसी वालंटियर में सीरियस साइड इफेक्‍ट्स देखने को नहीं मिले हैं. वहीं दूसरी तरफ ऑक्‍सफर्ड-अस्‍त्राजेनेका के इंटरनैशनल ट्रायल में वैक्‍सीन 90% तक असरदार पाई गई है. इतनी एफेकसी तब मिली जब लोगों को आधी डोज पहले और फिर फुल डोज दी गई.

Covaxin दो तरह के बूस्‍टर यूज करती है, ऐसे में ये बाकी इनऐक्टिवेटेड SARS-CoV-2 टीकों के मुकाबले बेहतर साबित हो सकती है. खास बात है कि ये वैक्सीन गंभीर लक्षणों को रोकने में और मौत को टालने में 100% इफेक्टिव है.

कोवीशील्ड कहाँ की है किसने बनाई और कैसे बनाई ?

कोवीशील्ड को ऑक्‍सफर्ड यूनिवर्सिटी और अस्‍त्राजेनका ने मिलकर डिवेलप किया गया है. अब इसे भारत में सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया तैयार कर रही है. इसमें चिम्पांजी में पाए जाने वाले एडेनोवायरस ChAD0x1 का इस्तेमाल कर उससे कोरोना वायरस जैसा ही स्पाइक प्रोटीन बनाया गया है. मगर इससे बीमारी नहीं होती. जब ये वैक्‍सीन लगती है तो वो इम्‍युन सिस्‍टम को किसी कोरोना वायरस संक्रमण से लड़ने के लिए तैयार करती है.

चार से 12 ह़फ़्तों के अंतराल पर इसकी दो ख़ुराक लोगों को दी जाती है. इसका भंडारण करना काफ़ी आसान है क्योंकि इसके लिए दो से आठ डिग्री के तापमान की ज़रूरत होती है. इसके ट्रायल बताते हैं कि जब लोगों को एक आधा ख़ुराक और फिर एक पूरी ख़ुराक दी गई तब वह 90 फ़ीसद तक प्रभावी थी. पहली और दूसरी डोज के बीच एक लंबा अंतर रखने से वैक्सीन का प्रभाव बढ़ जाता है. एक उप-समूह में देखा गया कि पहली ख़ुराक देने के बाद टीका 70 फ़ीसद प्रभावी है. सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया (एसआईआई) ने दावा किया है कि कोविशील्ड को बहुत अधिक प्रभावी पाया गया है.

स्पुतनिक V कहाँ की है किसने बनाई और कैसे बनाई ?

स्पुतनिक V को मॉस्को के गामालेया इंस्टीट्यूट ने रशियन डेवलपमेंट एंड इन्वेस्टमेंट फंड (RDIF) के साथ मिलकर बनाया है. ये एक रूसी वैक्सीन है. इसे एक के बजाय दो वायरस से बनाया गया है. इसमें दोनों डोज अलग-अलग होते हैं. इसे बनाने के लिए सर्दी का कारण बनने वाले वायरस का उपयोग किया गया है. इस वायरस का उपयोग कोरोना वायरस के छोटे अंश को शरीर में डालने के लिए वाहक के रूप में किया गया है. और इसमें ऐसे बदलाव किए गए हैं कि शरीर में जाने के बाद वह लोगों को नुक़सान न पहुँचा सके.

स्पुतनिक V टीका लगाने के बाद शरीर कोरोना वायरस के अनुरूप एंटीबॉडी बनाना शुरू कर देता है. मतलब कि टीके के बाद शरीर का इम्यून सिस्टम वास्तव में कोरोना वायरस से लड़ने के लिए तैयार हो जाता है. स्पुतनिक V पहली और दूसरी ख़ुराक के लिए टीके के दो अलग-अलग संस्करण का उपयोग करता है. वैसे दूसरी ख़ुराक पहली के 21 दिन बाद लगाया जाता है.

इसमें दोनों डोज अलग-अलग होते हैं. इसके पीछे तर्क ये है कि दो अलग-अलग वेक्टर के उपयोग से शरीर का इम्यून सिस्टम तब की तुलना में ज़्यादा मज़बूत होगा जब शरीर में एक ही वेक्टर दो बार जाए. स्पुतनिक V सबसे अधिक 91.6% इफेक्टिव रही है.

आपको कौन सी वैक्सीन लगवानी चाहिए ?

तीनों वैक्सीन में सबसे असरदार दिख रही है वो है स्पुतनिक V जो सबसे ज्यादा 91.6% इफेक्टिव है. लेकिन कोरोना वायरस के कई नए म्यूटेंट स्ट्रेन्स कई देशों में हैं. जैसे UK केंट स्ट्रेन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीकी स्ट्रेन के साथ ही डबल म्यूटेंट और ट्रिपल म्यूटेंट स्ट्रेन कई देशों में मिले हैं. ऐसे में अब तक यही साबित हुआ है कि कोवैक्सिन ही है जो इन सभी वैरिएंट्स के खिलाफ कारगर है. कोवीशील्ड और स्पुतनिक V को लेकर अब तक ऐसा कोई दावा या स्टडी नहीं की गई है जो इन सभी स्ट्रेन्स में असरदार हो.

आपको बतादें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 1 मार्च को कोवैक्सिन का पहला डोज लिया था. और 8 अप्रैल को उन्होंने दूसरा डोज लिया था.

इन तीनों वैक्सीन का असर कब तक रहेगा ?

ये सभी वैक्सीन वायरस से लड़ने में कारगर तो हैं लेकिन बड़ी बात ये है कि ये कितने दिन तक असर दिखाएंगी, इसके तो ट्रायल्स ही नहीं हुए है. लेकिन कुछ विशेषज्ञों का दावा है कि कोरोना के खिलाफ बनी एंटीबॉडी 9 से 12 महीने तो इफेक्टिव रहेगी ही. वहीं हाल ही में फाइजर की वैक्सीन को लेकर कहा था कि सालभर के अंदर तीसरा डोज लगाने की जरूरत पड़ सकती है. लेकिन इसके आगे अभी कोई जानकारी नहीं है. फिलहाल के लिए ये तीनों वैक्सीन मौजूदा संकट से दूर रखने में कारगर है. अगर आपने दो डोज लिए हैं तो इन्फेक्शन हुआ भी तो वो सामान्य सर्दी-जुकाम जैसा होगा. और कम दिनों में ठीक भी हो जाएगा.

ऐसे लोग डॉक्टर से सलाह लेकर लगवाएं वैक्सीन

वैक्सीन लगवाना बहुत जरुरी है लेकिन जिन लोगों को किसी भी तरह के खाद्य पदार्थ या दवाओं से एलर्जी है, उन्हें वैक्सीन नहीं लगानी चाहिए. पहले अपने डॉक्टर से परामर्श लें फिर कोई फैसला लें. और अगर एक डोज लेने पर कोई भी परेशानी आती है तो दूसरा डोज लेने से पहले डॉक्टर से बात करें, तब कोई फैसला लें. जिन लोगों को मोनोक्लोनल एंटीबॉडी या प्लाज्मा थैरेपी दी गई है, उन्हें भी वैक्सीन नहीं लगवानी चाहिए.

वहीं जिन लोगों में प्लेटलेट्स कम हैं या जिन्होंने स्टेरॉइड ट्रीटमेंट लिया है, उन्हें वैक्सीन का डोज देने के बाद निगरानी में रखा जा रहा है. 18 साल से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान करा रही महिलाओं को सरकार ने वैक्सीन के डोज लेने से फिलहाल मना किया है. इसके साथ ही, जिन लोगों में कोरोना के लक्षण हैं या जो पूरी तरह रिकवर नहीं हुए हैं, उन्हें भी रुकना चाहिए. वैज्ञानिकों ने भी कहा है जिन लोगों को कोरोना हो चुका है वे 6 महीने बाद ही टीका लगवाएं.

तीनों वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स क्या हैं ?

साइड इफेक्ट्स की बात करें तो तीनों वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स एक जैसे ही हैं. तीनों ही वैक्सीन इंट्रा-मस्कुलर होने से हाथ में काफी अंदर तक इसकी सुई जाती है. इससे इंजेक्शन की जगह पर दर्द, सूजन बेहद आम है. इनमें से किसी भी वैक्सीन को लेने के बाद हल्का बुखार, सर्दी-जुकाम, शरीर में दर्द जैसी शिकायत हो सकती है और नहीं भी हो सकती है. हो जाये तब भी घबराने की बात नहीं है. वैक्सीन लेने के बाद कम-से-कम दो दिन तक आराम करना जरूरी है. इससे बुखार और सर्दी की संभावना कम हो जाती है. कोई भी दिक्कत होती है तो डॉक्टर से परामर्श लें और लक्षण के अनुसार दवा लें.

वैक्सीन लगवाते समय ध्यान रखें-

तीनों टीके अलग-अलग हैं और शरीर के इम्‍युन रेस्‍पांस पर भी उनका असर अलग-अलग है. इसलिए टीकाकरण के दौरान आपको ये ध्यान रखना होगा की एक ही वैक्‍सीन के फुल डोज आपको लगें. मतलब की अगर आपने कोवैक्सीन लगवाया है तो दूसरी डोज कोवैक्सीन की ही होनी चाहिए. अगर दोनों डोज अलग-अलग वैक्‍सीन की हुईं तो शरीर पर इसका बेहद बुरा असर पड़ सकता है, इसके अलावा कोविड से प्रोटेक्‍शन भी नहीं मिलेगी. भारत में टीकाकरण के दौरान ये बताया भी जा रहा है कि पहला और दूसरा टीका एक ही कंपनी का लगे.

ये तो हो गई तीनों वैक्सीन की बात अब हम बात करते हैं DRDO ने जो कोरोना वायरस की दवा बनाई है इसको कैसे कब और क्यों खानी है. रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी डीआरडीओ ने एंटी कोरोना ड्रग 2DG को तैयार किया है.

पहले DRDO कोविड अस्पताल में दी जाएगी दवा

2-डीऑक्सी-डी-ग्लूकोज (2-डीजी) कोरोना रोधी दवा है. ये दवा एक पाउडर के रूप में है. इस दवा को सबसे पहले दिल्ली के DRDO कोविड अस्पताल में भर्ती मरीजों को दिया जाएगा. डीआरडीओ की ये दवा ऐसे समय में आई है, जब कोरोना की दूसरी लहर ने कोहराम मचा रखा है और तीसरी लहर की चर्चा हो रही है. कोरोना की देसी दवा 2-डीजी पाउडर के रूप में पैकेट में आती है और इसे पानी में घोल कर पीना होता है.

ये दवा कोरोना वायरस से संक्रमित कोशिकाओं पर सीधा काम करेगी. शरीर का इम्यून सिस्टम काम करेगा और मरीज जल्दी ठीक होगा. इसे मरीज के वजन और डॉक्टर के प्रिसक्रिप्शन के आधार पर कम से कम 5-7 दिन सुबह-शाम 2 डोज लेनी है.

मरीजों को तेजी से ठीक करती है ये दवा

इस दवा को कोरोना के मरीजों के लिए काफी असरदार मानी जा रही है. ये दवा कोरोना मरीजों को तेजी से ठीक होने में मदद करेगी और उनकी ऑक्सीजन पर निर्भरता को कम करेगी. इस दवा को रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के इनमास लैब के वैज्ञानिकों ने डाक्टर रेड्डी लैब्स के साथ मिलकर बनाई है. इस दवा के मरीजों पर इस्तेमाल को डीसीजीआई ने भी मंजूरी दे दी है.

मरीज के शरीर से ग्लूकोज लेता है कोरोना

एक्सपर्ट ने बताया की ये दवा ग्लूकोज का एक सब्स्टिट्यूट है. दरअसल कोरोना वायरस अपनी एनर्जी को बढ़ाने के लिए मरीज के शरीर से ग्लूकोज लेता है, मगर 2DG देने के बाद कोरोना वायरस ग्लूकोज के धोखे में इस दवा का इस्तेमाल करने लगता है. इससे वायरस को एनर्जी मिलना बंद हो जाती है और उनका वायरल सिंथेसिस बंद होने लगता है. मतलब इस तरह नए वायरस का बनना बंद हो जाता है साथ ही बाकी बचे वायरस भी मरने लगते हैं.

ट्रायल में मिला अच्छा रिस्पॉन्स

इस दवा को बनाने में लगभग एक साल का समय लगा है. पिछले साल अप्रैल में इस दवा के पहले चरण का ट्रायल किया गया था, जिसमें पाया गया था कि ये दवा कोरोना संक्रमण को बढ़ने से रोकती है. इसी के आधार पर दूसरे चरण का ट्रायल किया गया था. इसके बाद देशभर के 11 अस्पतालों में फेज II B क्लीनिकल ट्रायल किया गया था. फिर देशभर के 27 अस्पतालों में इस दवा का आखिरी ट्रायल किया गया था. सभी ट्रायल में इसका अच्छा प्रभाव दिखा जिसके बाद गंभीर लक्षण वाले मरीजों पर इस दवा के आपातकालीन इस्तेमाल को डीसीजीआई की ओर से मंजूरी मिल गई है.

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