क्या इतनी जल्दी मिल जाएगी कोरोना वैक्सीन ? कैसे होती है तैयार, जानें:- ज़रा सी चूक में जा सकती है हज़ारों की जान

कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने को लेकर पूरी दुनिया में होड़ मची है कि हम पहले इस वायरस की दवा बना लें और पूरे विश्व में छा जायें. लेकिन ये जितना सुनने में आसान है उतना हकीकत में नहीं है. जरा सी लापरवाही करोड़ो लोगों की जिन्दगी खतरे में डाल सकती है. कैसे वो पढ़ें और समझें:-

Corona vaccine will be available soon ?
Corona vaccine will be available soon ?

आपको मालूम होगा की इसी हफ्ते आईसीएमआर की तरफ से कोरोना की वैक्सीन पर काम कर रही 12 संस्थानों को पत्र लिखकर फास्ट ट्रैक क्लीनिकल ट्रायल करने के लिए कहा था. इसमें कहा गया था कि संस्था स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त को वैक्सीन लॉन्च करने के बारे में सोच रही है. जिसे सुनकर पूरा देश खुश हो गया था कि अब कोरोना वायरस से थोड़ी राहत मिलेगी.

वहीं देश में कोरोना की पहली वैक्सीन ‘कोवैक्सीन’ को हैदराबाद की फार्मा कंपनी भारत बायोटेक ने तैयार किया है. इसे आईसीएमआर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, पुणे के साथ मिलकर बनाया गया है. जानवरों पर इसका ट्रायल कामयाब रहा है. इंसानों पर परीक्षण के लिए इसे हाल ही में मंजूरी मिली है. ये ट्रायल इसी महीने शुरू हो रहे हैं.

लेकिन विशेषज्ञों ने वैक्सीन बनाने की जल्दबाजी को लेकर सवाल उठाए हैं. विशेषज्ञों ने भारत के शीर्ष चिकित्सा निकाय की विश्वसनीयता को धूमिल करने का आरोप लगाया है. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के पूर्व सचिव के सुजाता राव ने कहा, महत्वाकांक्षी होना अच्छी बात है, लेकिन टीका की सुरक्षा और प्रभाव की कीमत पर नहीं. ये 2021 के बजाय 2020 तक वैक्सीन तैयार करने की बात कहना एक टाइपिंग मिस्टेक है.

विषाणु वैज्ञानिक उपासना राय ने कहा कि कोविड-19 के टीके में क्या हम बहुत ज्यादा जल्दबाजी कर रहे हैं. सीआईएसआर-आईआईसीबी कोलकाता में वरिष्ठ वैज्ञानिक रे ने कहा, हमें सावधानी से आगे बढ़ना चाहिए. इस परियोजना को उच्च प्राथमिकता देना अति आवश्यक है.

एक्सपर्ट्स ने भी चेतावनी दी है कि समय से पहले वैक्सीन रिलीज करना फायदे से ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है. 1955 में ओरिजिनल साल्क पोलियो की वैक्सीन को बनाने में जल्दबाजी दिखाई गई थी, लेकिन इससे कोई अच्छे परिणाम नहीं मिले थे. बड़े स्तर पर वैक्सीन के निर्माण में हुई गड़बड़ी के कारण 70 हजार बच्चे पोलियो की चपेट में आ गए थे. 10 बच्चों की मौत हो गई थी.

वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक दुनिया में 131 वैक्सीन प्री-क्लिनिकल स्टेज में हैं, जबकि 17 वैक्सीन ह्यूमन क्लिनिकल ट्रायल तक पहुंच गई हैं. अनुमान लगाया जा रहा है कि साल के आखिर तक हमारे पास कोविड-19 (COVID-19) वायरस से निपटने के लिए एक कारगर वैक्सीन होगी. टीका जल्द से जल्द बने, इसके लिए वैज्ञानिक ही काम नहीं कर रहे, बल्कि इसमें उन लोगों का भी योगदान है, जो ट्रायल का हिस्सा हैं. ये अपने शरीर पर कई तरह के ड्रग्स का टेस्ट करवाने को राजी हुए हैं.

अब जानिए ह्यूमन क्लिनिकल ट्रायल में कितना ख़तरा है-

पहली बात की हर कोई ट्रायल में शामिल नहीं हो सकता, इसके लिए कई शर्तें होती हैं. आपके हेल्थ की जांच भी होती है. जो ट्रायल के लिए तैयार होते हैं वैज्ञानिक उन्हें पहले बीमारी और उसके वर्तमान में चल रहे इलाज के बारे में बताते हैं. साथ ही नए परीक्षण की पूरी जानकारी दी जाती है कि ट्रायल में क्या होगा और शरीर पर कैसा असर हो सकता है. इसके बाद लोगों से सहमति पत्र साइन किया जाता है और फिर ट्रायल की शुरुआत होती है. इसमें लगातार आपकी निगरानी होती है.

ट्रायल शुरू करते समय एकदम से ज्यादा लोगों को लेकर ट्रायल नहीं होता, पहले छोटे समूह पर जांच होती है. इसमें भी तीन चरण होते हैं. पहला चरण फेज जीरो होता है. इसमें 11 से 15 व्यक्ति को ट्रायल में शामिल कर दवा या वैक्सीन का डोज काफी कम मात्रा में दिया जाता है, सिर्फ ये जांचने के लिए कि कहीं इसका कोई खतरनाक असर तो नहीं हो रहा. अगर असर ठीक न दिखता तो ट्रायल रोक दिया जाता है और वैज्ञानिक दोबारा रिसर्च करते हैं.

फिर दूसरे चरण फेज 1 के दौरान लगभग 20 से 80 लोगों पर जांचकर्ता कई महीनों तक दवा के प्रभाव को देखते हैं. इस स्टेप का मकसद इस बात की जांच करना है कि दवा या वैक्सीन की ज्यादा खुराक या कितनी ज्यादा खुराक ली जाए, जिसका शरीर पर कोई साइड इफेक्ट न हो. इसी फेज में ये तय होता है कि दवा को कैसे दिया जाए, जिससे वो ज्यादा असर करे यानी सीरप के रूप में, कैप्सूल की तरह या फिर नसों के जरिए.

तीसरे चरण यानी फेज 2 ट्रायल तीनों चरण की सफलता के बाद ही दवा आगे प्रोसेस होती है. इसके बाद दवा सुरक्षित मान ली जाती है. हालांकि इसके बाद भी एक स्टेप होता है. इसमें पक्का किया जाता है कि दवा सेफ है और उसका असर मौजूदा दवा से ज्यादा नहीं होगा तो कम भी नहीं होगा. मुश्किल से 25 से 30% दवाएं ही इस चरण तक पहंच पाती हैं. चौथे और आखिरी चरण (phase IV) की शुरुआत तब होती है, जब FDA दवा या टीके को अप्रूव कर चुका हो. ये बाजार में भी आ चुकी होती है. लेकिन इसके बाद भी लंबे समय तक चलने वाली दवा के साइड इफेक्ट को समझने के लिए ये चरण होता है.

ह्यूमन ट्रायल में कई खतरे भी होते हैं. जो लोग इसका हिस्सा बनते हैं उनके लिए ये काफी लंबी प्रक्रिया भी होती है. ट्रायल में अगर किसी डोज से किसी को नुकसान हो तो इसे serious adverse event (SAE) कहते हैं. ये इतना गंभीर होता है कि जरा सी चूक में ट्रायल में शामिल व्यक्ति की जान भी जा सकती है. या फिर प्रतिभागी गंभीर रूप से बीमार हो सकता है. डोज के ज्यादा मात्रा में दिए जाने या थोड़ी भी गड़बड़ी से पैरलिसिस या फिर किसी अंग विशेष में खराबी आ सकती है. यानी नतीजे जांचने में जरा भी लापरवाही हो तो लोगों की सेहत पर उल्टा असर हो सकता है.

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