जब बाला साहब की एक आवाज़ से पीछे हट गए थे ‘आतंकी’, पूरे महाराष्ट्र को कराया ‘आज़ाद’

Ulta Chasma Uc  :  मुंम्बई आज जो भी है उसके पीछे बाला साहब का हाथ है. वरना जिस मुम्बई पर दाऊद का साया था वो कभी आजाद नही रहती. वसूली करना और बड़े बड़े सेलिब्रिटी को डराकर काम कारवना माफियाओं की कमाई का सबसे बड़ा जरिया बन चूका था. एक कार्टून बनने वाले बाला साहब अपनी तेज़ तर्रार शख्शियत की वजह से सिर्फ मुम्बई नही पूरे महाराष्ट्र के पहचान बन गए.

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तेज़ तर्रार शख्शियत बाला साहब

बाला साहब का जन्म 23 जनवरी 1926 को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ था. बाला साहब की चार बड़ी बहने थी और परिवार में सबसे छोटा होने के कारण वो बचपन से जिद्दी थे. किसी को नही पता था की उनकी यह जिद्दी होने की आदत भविष्य में उन्हें महाराष्ट्र का बादशाह बना देगी. बाला साहब अपनी जुबान के लिए जाने जाते थे जो बोल दिया वो करना है तो करना है. 1990 में जब कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से भगाया जा रहा था और आतंकियों ने अमरनाथ यात्रा बंद करने की धमकी दी थी वो बाला साहब ने मुम्बई से सिर्फ एक बार बोला था कि अगर हिन्दू अमरनाथ नही जा सकते है तो मुम्बई की जमीन से कोई मक्का भी नही जाने दिया जाएगा.

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फोटो सौ. bbchindi

फिर क्या सिर्फ 24 घण्टे से अंदर आतंकी अपनी दी गयी धमकी से पीछे हट गए. बाला साहब अपने जीवनकाल में कभी कभी चुनाव नही लड़े. लेकिन मुख्यमंत्री वही बनाते थे. सरकार किसी की भी हो वो कब तक सत्ता में रहेगी ये बाला साहब के हाथ में था. बाला साहब को हिन्दू ह्रदय सम्राट कहा जाता था वो खुलकर हिंदुत्व के पक्ष में थे. जो दिल मे आता था वो जुबा पर रखते थे. जिसे लोगो ने पसन्द किया और उन्हें पूरे महाराष्ट्र का बादशाह बना दिया. बहुत कम लोग जानते है कि 1950 के दशक में बाला साहब ने बम्बई को महाराष्ट्र को राजधानी बनाने के लिए भी काफी काम किया.

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narendra modi and bal thackre

बाला साहब ने 1960 में अपना एक स्वत्रन्त्र वीकली पेपर निकला था जिसका नाम मार्मिक था. जिसे वहाँ काफी पसंद किया गया अपनी मजबूत होती ज़मीन को देखते हुए बाला साहब ने पेपर निकलने के 6 साल बाद ही एक कट्टर हिन्दूवादी संगठन शिव सेना की स्थापना कर दी. जिसका लक्ष्य मराठियों के हितों की रक्षा करना और उन्हें नौकरियों, आवास की सुविधा उपलब्ध करवाना था. साल 1989 से शिवसेना और बाल ठाकरे के विचारों को जनता तक पहुंचाने के लिए समाचार पत्र ‘सामना’ को भी प्रकाशित किया जाने लगा. लेकिन पार्टी को सफलता 1995 में मिली और भाजपा के साथ गठबंधन करके शिव सेना ने सरकार बनाई. शिव सेना को भाजपा से दोस्ती करने का फायदा भी मिला जिसकी वजह से शिव सेना अपनी पकड़ दिल्ली तक बना पाई.

शिवसेना का बुरा समय साल 2005 से शुरू हुआ जब शिव सेना में फूट पड़ गयी और राज ठाकरे ने शिव सेना छोड़ दी, राज का मानना था कि उद्धव को पार्टी में उनसे ज्यादा एहमियत दी जा रही है. पार्टी से अलग होते ही राज ठाकरे ने अपनी पार्टी बना दी जिसका मकसद अलग नही था वो भी शिव सेना और बाला साहब के दिखाए रास्ते पर चलना था. लोगो को राज में बाला साहब की झलक दिखती थी यही वजह जबकि उद्धव में बाला साहब वाली बात नही दिखी.

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बाला साहब की अंतिम विदाई

25 जुलाई 2012 को बाला साहब का एक लंबी बीमारी से लड़ते हुए ठीक 6 साल पहले, आज ही के दिन, 17 नवम्बर 2012 को देहान्त हो गया. लेकिन बाला साहब की मौत के बाद मुम्बई शांत हो गयी थी लाखो की भीड़ उनकी अंतिम यात्रा के दौरान सड़कों पर आ गयी थी. चारो तरफ से सिर्फ एक ही आवाज आ रही थी बाला साहब अमर रहे… अमर रहे…

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