क्या कोरोना आपातकाल में गंगा में लाशें तैरना न्यू नॉर्मल है : संपादकीय

दोस्तों हमारे लिए सब कुछ न्यू नॉर्मल होना कितना आसान हो जाता है..अब हमें आदत हो चुकी है अब श्मसानों में अपनी बारी का इंतजार करती लाशों की कतार हमको विचलित नहीं करती..लाइन से जलती लाशें अब हमें विचलित नहीं करतीं..ये अब हमारे लिए न्यू नॉर्मल हो चुकी हैं..अब कुओं में तालाबों में और नदियों में उतराती लाशों का दौर आ चुका है..गंगा जो पाप धोती थी हिंदुस्तान में लाशें ढो रही है.अब गंगा और यमुना में तैरती लाशें देखकर आपका मन व्याकुल क्यों हो रहा है…ये भी कुछ दिनों में न्यू नॉर्मल हो जाएगा..कुछ दिनों में नदियों में बहती लाशें मछलियों का चारा बता दी जाएंगी..जीवों पर दया करने वाला समाज इसे न्यू नॉर्मल समझकर स्वीकार कर लेगा..

मैं प्रधानमंत्री नहीं हूं..मैं अपना काम छोड़कर रैलियां नहीं कर सकती..मैं रिपोर्टर हूं..समाचार बताना मेरा काम है..तो चलिए समाचार जान लीजिए..प्रयागराज में गंगा यमुना सरस्वती तीन नदियां आपस में मिल जाती हैं..फिर सब गंगा हो जाती हैं..गंगा यूपी बिहार बंगाल के रास्ते गंगा बंगाल की खाड़ी में गिर जाती है..लेकिन बिहार में एंटर करने से पहले उत्तर प्रदेश की सीमा में गंगा नदी में बलिया के उजियार और भरौली में 46 तैरती लाशें निकाली गई हैं..गाजीपुर में भी लाशें बहती हुई देखी गई हैं..बिहार के बक्सर में भी नदी में 40 लाशें दिखी हैं..यमुना नदी में भी बहती लाशों की खबरें हैं..बिहार वाले कहते हैं लाशें यूपी से बहकर आई होंगी हमारी नहीं हैं..यूपी के जिन जिलों में लाशें मिल रही हैं वहां का प्रशासन कह रहा है पिछले जिलों से बहकर आई होंगी हमारी लाशें नहीं हैं..

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उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में यमुना में कुछ लाशें मिलने की खबरें आईं..हर जिले का प्रशासन कह रहा है कि लाशें हमारी नहीं हैं..हमीरपुर का प्रशासन कहता है जो लाशें मिली हैं वो कोरोना संक्रमितों की नहीं हैं..लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि किसी के पास कोई सबूत नहीं है कि लाशें उनके जिले की हैं या नहीं हैं..या फिर डेडबॉडी कोरोना पॉजिट हैं या नहीं..जिला प्रशासन को अपनी इमेज बचानी है..उत्तर प्रदेश सरकार को अपनी इमेज बचानी है..भारत की बीजेपी सरकार को अपनी इमेज बचानी है..इसे बदकिस्मती ही करिए की गंगा नदी सरहद पार से नहीं आई है वर्ना लाशें दूसरे मुल्क की साबित करने में 5 मिनट नहीं लगते..

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गंगा में नाव चलाने वाले नाविक का कहना है कि इतनी संख्या में लाशें उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में कभी नहीं देखीं..लोग दूर दराज के गांवों से आते हैं और लाशें फेंककर चले जाते हैं.. आशंका जताई जा रही है कि जब लाश जलाने का खर्च लाश से ज्यादा हो जाता है..तो परिवार वाले लाश गंगा में फेंककर चले जाते होंगे .परिवार वालें भी कहां तक मोह करें..पैसे बच चाएंगे तो घर के दूसरे सदस्य को कम से कम श्मसान तक पहुंचाने के तो काम आएंगे..

DISCLAMER- लेख में प्रस्तुत तथ्य/विचार लेखक के अपने हैं. किसी तथ्य के लिए ULTA CHASMA UC उत्तरदायी नहीं है. लेखक एक रिपोर्टर हैं. लेख में अपने समाजिक अनुभव से सीखे गए व्यहवार और लोक भाषा का इस्तेमाल किया है. लेखक का मक्सद किसी व्यक्ति समाज धर्म या सरकार की धवि को धूमिल करना नहीं है. लेख के माध्यम से समाज में सुधार और पारदर्शिता लाना है.

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