भगत सिंह के वो आख़िरी 12 घंटे… फांसी के ठीक पहले… !

महान क्रांतिकारी भगत सिंह को अंग्रेजों ने 23 मार्च 1931 की सुबह 7:30 बजे लाहौर में फांसी दे दी थी, ये वक्त तय किए गए वक्त से 12 घंटे पहले का था. वक्त बदलने का कारण ब्रिटिश सेना का डर था क्योंकि उन्हें पता था भारतीयों को भगत सिंह का इस तरह से जाना बर्दाश्त नहीं होगा…

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भगत सिंह बचपन से ही अपने आपको देश के लिए समर्पित कर चुके थे, वे किताबों के बड़े आदि थे इतना कि अपने आख़िरी पलों में भी कार्ल लीबनेख़्त की ‘मिलिट्रिज़म’, लेनिन की ‘लेफ़्ट विंग कम्युनिज़म’ और आप्टन सिंक्लेयर का उपन्यास ‘द स्पाई’, पूरी ख़त्म करना चाहते थे… भगत सिंह को फांसी दिए जाने से ठीक दो घंटे पहले उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे थे. मेहता को देखते ही भगत सिंह के शब्द थे कि आप मेरी किताब ‘रिवॉल्युशनरी लेनिन’ लाए या नहीं? जब मेहता ने उन्हें किताब दी तो उसे देखकर मुस्कुराए और उसी समय जल्दी-जलदी पढ़ने लगे मानो उनके पास अब ज़्यादा समय न बचा हो…

प्राण नाथ मेहता ने लिखा है कि “उस वक्त भगत सिंह अपनी छोटी सी कोठरी में पिंजड़े में बंद शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे” भगत सिंह जेल को कठिन ज़िंदगी की आदत हो चली थी. उनकी कोठरी नंबर 14 का फ़र्श पक्का नहीं था, उस पर काई उगी हुई थी. कोठरी में बस इतनी ही जगह थी कि उनका पाँच फ़ुट, दस इंच का शरीर बमुश्किल उसमें सिमट पाए.

भगत सिंह नास्तिक थे, ईश्वर को कोस्तें थे-

आज जब धार्मिक आस्था और देश प्रेम की भावना को एक दूसरे के विपरीत खड़ा कर दिया गया है, और धर्म के नाम पर हर तरफ ब्रांडिंग चल रही है तो भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी की भावना को समझना या समझाना मुश्किल है, लेकिन फिर भी जानकारी पूरी होना ज़रूरी है…

एक स्वतन्त्रता सेनानी थे बाबा रणधीर सिंह 1930-31 के बीच लाहौर के सेन्ट्रल जेल में भगत सिंह के साथ वे भी थे… वे एक कट्टर धार्मिक व्यक्ति थे जिन्हें ये जान कर बड़ा दुख हुआ कि भगत सिंह का ईश्वर पर कतई विश्वास नहीं है, वे भगत सिंह की निडरता और हिम्मत से काफी प्रभावित थे तो उन्होंने सोचा कि अगर मै भगत सिंह के मन में ईश्वर के प्रति विश्वास जगा पाया तो पुण्य कमाकर जाऊंगा…

जैसे तैसे वे भगत सिंह की कालकोठरी तक पहुँचने में सफल हुए और उन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन दिलाने की कोशिश में लग गए, तमाम कोशिशों के बाद असफल होने पर बाबा ने नाराज होकर भगत सिंह को कहा, “प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है और तुम अहंकारी बन गए हो जो कि एक काले पर्दे के तरह तुम्हारे और ईश्वर के बीच खड़ी है, इस टिप्पणी के जवाब में ही भगत सिंह ने जेल में एक लंबा लेख लिखा जिसे 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के एक प्रतिष्ठित अखबार “द पीपल” ने प्रकाशित किया…

उनके लेख का एक अंश ये था –

“मेरा नास्तिकतावाद कोई अभी हाल की उत्पत्ति नहीं है. मैंने तो ईश्वर पर विश्वास करना तब छोड़ दिया था, जब मैं एक अप्रसिद्ध नौजवान था. कम से कम एक कालेज का विद्यार्थी तो ऐसे किसी अनुचित अहंकार को नहीं पाल-पोस सकता, जो उसे नास्तिकता की ओर ले जाये. यद्यपि मैं कुछ अध्यापकों का चहेता था और कुछ अन्य को मैं अच्छा नहीं लगता था. पर मैं कभी भी बहुत मेहनती और पढ़ाकू विद्यार्थी नहीं रहा. अहंकार जैसी भावना में फँसने का कोई मौका ही न मिल सका. मैं तो एक बहुत लज्जालु स्वभाव का लड़का था. जिसके भविष्य के बारे में कुछ निराशावादी प्रकृति थी. अगर आपका विश्वास है कि एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सर्वज्ञानी ईश्वर है, जिसने इस विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे ये बतायें कि उसने ये रचना क्यों की ? कष्टों और संतापों से पूर्ण दुनिया – असंख्य दुखों के शाश्वत अनन्त गठबन्धनों से ग्रसित एक भी व्यक्ति तो पूरी तरह संतृष्ट नही है.

कृपया ये न कहें कि यही उसका नियम है. अगर वो किसी नियम से बँधा है तो वो सर्वशक्तिमान नहीं है. इसे अपने लिये अपमानजनक और भ्रष्ट होने की बात समझाता हूँ. स्वार्थी कारणों से मैं प्रार्थना नहीं करूँगा’’ पाठकों और दोस्तों, क्या ये अहंकार है? अगर है तो मैं स्वीकार करता हूँ.”

भगत सिंह हिंदुस्तान के लिए हस्ते-हस्ते शहीद हो गए लेकिन वो ईश्वर पर नहीं ख़ुद पर विश्वास करते थे. चट्टान जैसा विश्वास कभी ना टूटने वाला विश्वास… वे सवाल करते थे जिसका जवाब किसी के पास नहीं

भगत सिंह को कौन शहीद नहीं मानता ?

सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि जो देश की आजादी के लिए ब्रिटिश सरकार से लड़ रहा था. भारत की आजादी के 70 साल बाद भी सरकार उसे दस्तावेजों में शहीद नहीं मानती. अलबत्ता जनता ने भगत सिंह को शहीद-ए-आजम की उपाधि दी है… 2013 में केंद्रीय गृह मंत्रालय में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लेकर एक आरटीआई डाली गई, जिसमें पूछा गया कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को शहीद का दर्जा कब दिया गया. अगर नहीं तो उस पर क्या काम चल रहा है? इस पर नौ मई को गृह मंत्रालय का हैरान करने वाला जवाब आया कि, इस संबंध में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है. तब से शहीद-ए-आजम के वंशज (प्रपौत्र) यादवेंद्र सिंह संधू सरकार के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं.

जेल तक किताबें कैसे पहुंचती थीं?

जेल वॉर्डेन चरत सिंह भगत सिंह के मित्र बन गए थे और अपनी तरफ़ से जो कुछ बन पड़ता था वे उनके लिए करते थे. उनकी वजह से ही लाहौर की द्वारकादास लाइब्रेरी से भगत सिंह के लिए उनकी पसंद की किताबें निकल कर जेल के अंदर तक आ पाती थीं… चरत सिंह ने ही भगत सिंह को बताया की उपर से आदेश है आपको 12 घंटे पहले ही फांसी के तख्ते पर लटकाया जाएगा… भगत सिंह जब गैलरी से ले जाए जा रहे थे तो पंजाब कांग्रेस के एक नेता भीमसेन सच्चर ने आवाज़ ऊँची कर उनसे पूछा था, कि “आप और आपके साथियों ने लाहौर कॉन्सपिरेसी केस में अपना बचाव क्यों नहीं किया?” तो भगत सिंह का जवाब था “इन्कलाबियों को मरना ही होता है, क्योंकि उनके मरने से ही उनका अभियान मज़बूत होता है, अदालत में अपील से नहीं.”

भगत सिंह का आख़िरी संदेश क्या था ?

भगत सिंह अपनी किताब ‘रिवॉल्युशनरी लेनिन’ पूरी पढ़ लेना चाहते थे, एक नज़र भी इधर उधर ना भटकाते हुए वो पन्ने पलटते जा रहे थे, तभी मेहता ने उनसे पूछा “देश के लिए आख़िरी संदेश ?” भगत सिंह ने किताब से अपना मुंह हटाए बग़ैर कहा, “सिर्फ़ दो संदेश”

“साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और ‘इंक़लाब ज़िदाबाद”

फांसी का समय 12 घटें पहले होने की वजह से ज़ल्दबाज़ी करके भी वो पूरी किताब नहीं पढ़ पाए और उन्होंने अपने मित्र जेल वार्डन चरत सिंह से कहा “आप लोग मुझे ये किताब भी ख़त्म करने नहीं देंगे” फांसी के लिए वजन नापतें समय चरत सिंह ने भगत सिंह के कान में फुसफुसा कर कहा कि “वाहे गुरु को याद करो,” भगत सिंह बोले, “पूरी ज़िदगी मैंने ईश्वर को याद नहीं किया… हां मैंने कई बार ग़रीबों के क्लेश के लिए ईश्वर को कोसा है, अगर मैं अब उनसे माफ़ी मांगू तो वो कहेंगे कि इससे बड़ा डरपोक कोई नहीं है इसका अंत नज़दीक आ रहा है..इसलिए ये माफ़ी मांगने आया है.”

देश के लिए भगत सिंह का अंतिम संदेश था

“साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और ‘इंक़लाब ज़िदाबाद”

उन पर राजनीति करने वाले तमाम हैं, लेकिन उनको समझने वाले बहुत कम हैं…
भगत सिंह आप अमर रहें, हम शर्मिंदा हैं!

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