राममंदिर पर बड़ा फैसला, कोर्ट ने कहा- जो पहले हुआ उसपर हमारा कोई निंयत्रण नहीं, पढ़ें फिर क्या हुआ ?

आज सुप्रीम कोर्ट में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद के मामले की सुनवाई हुई. इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ कर रही है. और जजों ने आज कई अहम् फैसले किये हैं.

ayodhya ram janm bhoomi hearing in supreme court
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सुनवाई के दौरान जस्टिस एसए बोबडे ने कहा, ये केवल ज़मीनी विवाद नहीं है, बल्कि भावनाओं, धर्म और विश्वास से जुड़ा मामला है. इसमें मध्यस्थ नहीं बल्कि मध्यस्थों का एक पैनल होना चाहिए. किसने आक्रमण किया, कौन राजा था, मंदिर था या मस्जिद. ये सब इतिहास की बातें हैं, कोई भी उस जगह बने और बिगड़े निर्माण या मंदिर-मस्जिद और इतिहास को पलट नहीं सकता, जो अतीत में हुआ उसपर हमारा कोई निंयत्रण नहीं है.

जस्टिस एसए बोबडे ने कहा, हमें वर्तमान विवाद के बारे में पता है. और हम केवल विवाद को सुलझाने को लेकर चिंतित हैं. इसलिए कोर्ट चाहता है कि आपसी बातचीत से इसका हल निकले. जस्टिस भूषण ने कहा कि अगर पब्लिक नोटिस दिया जाएगा तो मामला कई सालों तक चलेगा, वहीं जो मध्यस्थता होगी वो कोर्ट की निगरानी में होगी.

सुनवाई के दौरान हिन्दू महासभा के वकील हरिशंकर जैन ने कहा कि अयोध्या विवाद रिप्रेजेन्टेटिव सूट है, ऐसे में मध्यस्थता के लिए भेजने से पहले पब्लिक नोटिस निकालना पड़ेगा. निर्मोही अखाड़ा को छोड़कर रामलला सहित सभी हिन्दू पक्षकारों ने इस मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने का विरोध किया है. रामलला की ओर से कहा गया है कि अयोध्या का अर्थ है राम जन्मभूमि, मस्जिद किसी दूसरे स्थान पर बन सकती है. ये मामला बातचीत से हल नहीं हो सकता.

हिंदू पक्ष ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर सभी पक्षों में समझौता हो भी जाता है तो समाज इसे कैसे स्वीकार करेगा? इसपर जस्टिस बोबडे ने कहा कि कोर्ट समझौते पर सहमति देता है और आदेश पास करता है तो वो सभी को मानना होगा. मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने पक्षों से मध्यस्थ और मध्यस्थों के पैनल के नाम का सुझाव मांगा है.

मुस्लिम याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील राजीव धवन ने कहा, “मुस्लिम याचिकाकर्ता मध्यस्थता और समझौते के लिए तैयार हैं. बतादें, पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने गत 26 फरवरी को हिंदू-मुसलमान पक्षों के बीच मध्यस्थ के जरिये आपसी सहमति से विवाद सुलझाने का प्रस्ताव दिया था. कोर्ट ने कहा था कि अगर बातचीत के जरिये विवाद सुलझने की एक फीसद भी उम्मीद है तो कोशिश होनी चाहिए.