लोटनराम निषाद ने यूपी की राजनीति में मचा दी हलचल

2017 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद समाजवादी पार्टी में आमतौर पर केवल मुलायम सिंह यादव, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव या फिर समाजवादी पार्टी के सांसद आजन खान ही चर्चा में रहते हैं। लेकिन इस बार सपा का जो नेता चर्चा में आया है वो ना तो समाजवादी पार्टी में मंत्री रहा है और ना ही प्रदेश अध्यक्ष रहा है..

लोटनराम निषाद न सिर्फ उत्तर प्रदेश में इस समय सोशल मीडिया पर छाए हुए हैं। सामाजिक न्याय की पक्षधर ताकतों के बीच भी उनकी लोकप्रियता बढ़ गई है। नेताओं की चर्चा आमतौर पर तब होती है जब उन्हें पद मिल जाता है….लेकिन लोटनराम निषाद की चर्चा समाजवादी पार्टी के पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेशाध्यक्ष पद से हटाए जाने पर हो रही है।

 

लोटनराम निषाद समाज के न्याय की बात करने के लिए चर्चा में रहें हैं। लेकिन व्यापक चर्चा में वे पहली बार आए हैं। अंधविशवास और धर्मभीरुता के जाल से वंचित तबके को मुक्त कराने के उनके प्रयास ही उनकी पहचान रहे हैं और इसलिए अखिलेश यादव ने उन्हें पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ का प्रदेशाध्यक्ष का पद सौंपा था. ऐसा माना गया था कि इस नियुक्ति के जरिए समाजवादी पर्टी ने अपनी अलग विचाराधात्मक लाइन खींचने पहल की है।

लोटनराम निषाद से पद इसलिए छीन लिया गया क्योंकि कुछ पत्रकारों के द्वारा राम परशुराम और विष्णु के बारे में बार-बार पूछने पर कह दिया था कि उनकी राम में कोई व्यक्तिगत आस्था नहीं है और उनकी आस्था डॉ अंबेडकर, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, बीपी मंडल, कर्पूरी ठाकुर, रामचरण निषाद जैसे महान नेताओं में है, संविधान में है क्योंकि उनके या पिछड़ी जाति के जीवन में सकारात्मक बदलाव सिर्फ उन नेताओ के कारण आया है। और उन्होने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यह उनका अपना निजी विशवास है।

लोटनराम निषाद की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है की समाजवादी पिछडा वर्ग प्रकोष्ठ को उन्होंने सक्रिय कर दिया है और प्रदेश भर में खासतौर पर उन्होंने अति पिछड़ी जातियों के बीच के तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं को पार्टी से जोड़ा।

प्रभाशाली भाषण देने वाले लोटनराम निषाद से पहले सपा के पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेशाध्यक्ष पद पर राम आसरे विशवकर्मा मौजूदा प्रदेशाध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल और कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त दयाराम प्रजापति रहें हैं। राम आसरे विशवकर्मा मंत्री भी रहे हैं। लेकिन इनमें से किसी ने भी कार्यकाल के दौरान समाजवादी पिछडा वर्ग प्रकोष्ठ कोई खास पहचान नहीं बना पाया।

सभी की तुलना में लोटनराम निषाद के पास सत्ता का कभी कोई पद नहीं रहा है। इसके बावजूद 16 मार्च 2020 से 24 अगस्त 2020 तक के मात्र 5 महीने 10 दिन के कार्यकाल में संपर्क करके उन्होनें खास संख्या में भाजपा की ओर जा चुकी अति पिछड़ी जातियों के एक हिस्से को समाजवादी पार्टी की तरफ मोड़ने में सफलता पाई थी।

लोटनराम निषाद ने पत्रकारिता की पढ़ाई की है बीएचयू से की है और अपने कॉलेज के दिनों में ही उन्होंने तय कर लिया था कि वे सिर्फ सामान्य नौकरी करके अपने परिवार मात्र की बेहतरी करने के बजाए समाज के वंचित तबके को जागरुक करना और उसे सफल बनाना उनका मकसद रहेगा।

गाजीपुर के सरौली गांव में अपने सात भाइयों में चौथे नंबर के लोटनराम निषाद की पहचान तकरीबन सोलह साल तक लगातार प्रकाशित हुई पत्रिका निषाद के संपादक के तौर पर भी रही है। आरंभ में निषाद समुदाय के बीच लोकप्रिय रही ये पत्रिका आगे चलकर सामाजिक न्याय के एक मजबूत स्तंभ के रूप में बदल गई…

लोटनराम निषाद बताते हैं कि विदेशों में तो पाठक उनकी पत्रिका का इंतजार करते थे…जब उन्होंने कॉलेज से निकलने के बाद पर पत्रकारिता शुरू की तो सामाजिक न्याय के बारे में उनके लेख पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे जनता दल के गठन के समय से ही वे इससे जुड़ गए थे।और मंडल रिपोर्ट लागू करने के फैसले के बाद वो वी.पी सिंह के प्रबल समर्थक बन गए….जब वी.पी सिंह की किडनी खराब हुई थी तब लोटनराम उन्हें किडनी देने का प्रस्ताव देकर सुर्खियों में आ गए थे… वे कहते कि मंडल मसीहा वीपी सिंह की जान बचाने के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार था।

लेकिन बाद में जब वे समाजवादी पार्टी से जुड़े तो लोगों ने उन्हें यह सोचकर आर्थिक सहयोग देना बंद कर दिया कि अब तो शायद उनके पास धन की कमी नहीं रही हैं. इसी कारण से 2015 में सामाजिक न्याय के पत्रिका का प्रकाशन भी बंद हो गया था।

निषाद समुदाय के मुद्दों को वो लंबे समय से उठाते रहे। विभिन्न तबकों में बंटे निषाद समूह की जातियों में आपसी सामंजस्य स्थापित करने के लिए मल्लाह केवट बिंद कश्यप मांझी धीवर गोड़िया रैकवार आदि जातियों में आपसी वैवाहिक रिश्ते कराकर सबको एकता के सूत्र में बांधने का काम लोटनराम निषाद ने किया।

आंदोलकारी लोटनराम ने कई बड़े आंदोलन भी किए हैं। निषाद औऱ मछुआरा जातियों के आरक्षण और अधिकारों के लिए विधासभा से लेकर जंतर-मंतर तक कई आंदोलन किए। निषाद शक्ति पत्रिका के प्रकाशन के बंद होने के बाद उन्होंने जनता और कमजोर तबकों के बीच उन्होने ज्यादा समय बिताना शुरु कर दिया।

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