crossorigin="anonymous"> क्या है अनुच्छेद 35A..क्यों मचा है बवाल - Ulta Chasma Uc

क्या है अनुच्छेद 35A..क्यों मचा है बवाल

 

अनुच्छेद 35ए (ARTICAL 35A)–  अनुच्छेद  35A एक ऐसा संवैधानिक धोखा है जिसकी कीमत आज तक लाखों लोगों को चुका रहे हैं…जो कानून ना तो लोकसभा में पास हुआ..ना ही राज्यसभा में पास हुआ..गुपचुप तरीके से सीधे राष्ट्रपति से हस्ताक्षर कराए गए और लागू कर दिया गया..देश का संविधान 26 जनवरी 1951 को लागू हुआ..इसमें कश्मीर को विषेश राज्य का दर्जा देने वाला अनुच्छेद 370 भी था..लेकिन संविधान लागू होने के बाद किसी को बिना बताए गुप्त तरीके से 3 साल बाद यानी 1954 में इसमें एक अनुच्छेद 35A और जोड़ दिया गया..ये मूल संविधान नहीं है बल्कि परिशिष्ट में रखा गया इसलिए कई सालों तक इस बात का पता संसद में और कानून के जानकारों को चला ही नहीं…

 

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अनुच्छेद 35A ?
इमेज सौजन्य- हिंदुस्तान टाइम्स

 

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कानून कहता है कि बिना संसद में पास हुए कोई भी कानून नहीं बन सकता..वो अध्यादेश कहला सकता है..और अध्यादेश की उम्र 6 महीने से ज्यादा की नहीं होती..लेकिन कश्मीर में धारा 35A पिछले लगभग 70 सालों से अवैध तरीके से कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए लगाया रखा गया है…संविधान के अनुच्छेद 368 में कहा गया है कि बिना संसद के दोनों सदनों में पास हुए कोई भी कानून नहीं बन सकता..यहां एक नियम दूसरे नियम के विरोधो में खड़ा है..और इसीलिए गैर सरकारी संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में इसे हटाए जाने को लेकर जंग छेड़ दी..

 

 

 क्या है अनुच्छेद 35A ?

  • कश्मीर की महिला से गैर कश्मीरी शादी नहीं कर सकता
  • गैर कश्मीरी युवक से शादी करने पर कश्मीरी महिला कश्मीर में रोजगार और संपत्ति का अधिकार खो देगी
  • गैर कश्मीरी लड़की से वीवाह करने पर कश्मीरी मर्द के सारे आधिकार सुरक्षित रहते हैं
  • इस संविधान के मुताबिक कश्मीर का स्थायी नागरिक वो है जो 14 मई 1954 को राज्य का नागरिक रहा हो या फिर उससे पहले के 10 सालों से राज्य में रह रहा हो साथ ही उसने वहां संपत्ति हासिल की हो
  • पाकिस्तान से भागकर आए हिंदूओं को आज भी कश्मीर में वोट देने का आधिकार नहीं है संपत्ति खरीदने का आधिकार नहीं है
  • साल 1954 में 14 मई को राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने एक आदेश पारित किया था..इस आदेश के जरिए संविधान में नया अनुच्छेद 35A जोड़ दिया गया
  • अनुच्छेद 35-ए संविधान का वो आर्टिकल है जो जम्मू कश्मीर विधानसभा को लेकर प्रावधान करता है कि वो राज्य में स्थायी निवासियों को पारभाषित कर सके
  • साल 2014 में एक एनजीओ ने अर्जी दाखिल कर इस आर्टिकल को समाप्त करने की मांग की..ये केस सुप्रीम कोर्ट में है